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अक्तूबर में 56 लाख बैरल प्रतिदिन आयात: भारत ने दबाव को नकारा; रूस ही नहीं खाड़ी देशों से भी खरीदा कच्चा तेल
Sun, 01 Nov 2026 10:43 AM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Sun, 01 Nov 2026 10:43 AM IST
सार
भारत ने अक्तूबर में प्रतिदिन करीब 56 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात कर नया रिकॉर्ड बनाया। इस दौरान मध्य पूर्व और रूस दोनों से बड़ी मात्रा में आपूर्ति हुई। होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते सप्लाई सुधरने से भारतीय रिफाइनरियों को खरीद के अधिक विकल्प मिले हैं।
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होर्मुज में हालात बिगड़े तो फिर बढ़ सकती है रूसी तेल की खरीद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
भारत का कच्चे तेल का आयात अक्तूबर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। ऊर्जा क्षेत्र की खुफिया जानकारी देने वाली कंपनी केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान देश ने प्रतिदिन करीब 56 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों ने मध्य पूर्व और रूस से खरीद बढ़ाई।
केप्लर के प्रमुख विश्लेषक निखिल दुबे ने एक पोस्ट में बताया कि अक्तूबर में मध्य पूर्व से प्रतिदिन करीब 23 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति हुई, जबकि रूस से आयात लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन रहा।
भारत को क्यों मिल रहा सस्ता कच्चा तेल?
जहाज से जहाज के बीच तेल स्थानांतरित करने की बढ़ती गतिविधियों से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ज्यादा कच्चा तेल पहुंचाने में मदद मिली। इससे सितंबर और अक्तूबर में खाड़ी देशों से आपूर्ति में सुधार हुआ और भारतीय रिफाइनरियों को तेल खरीदने के लिए अधिक विकल्प मिले।
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दुबे के मुताबिक, नवंबर और दिसंबर में रूस से तेल की आपूर्ति कुछ कम हो सकती है। काला सागर में हमलों के कारण माल ढुलाई की दरें बढ़ रही हैं, जिससे कुल लागत के लिहाज से रूसी तेल कम आकर्षक हो सकता है। वहीं, खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता भारत में अपनी बाजार हिस्सेदारी दोबारा बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल दे रहे हैं।
रूस से तेल खरीदने की भी मिली छूट
हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल की आपूर्ति में फिर कोई रुकावट आती है तो भारतीय रिफाइनरियां परिवहन लागत बढ़ने के बावजूद रूसी तेल की खरीद दोबारा बढ़ा सकती हैं। उन्होंने कहा कि 16 अक्तूबर को ग्राहम एक्ट के तहत दी गई छूट से भी कुछ भारतीय खरीदारों की रूस से तेल खरीदने को लेकर चिंताएं कम हो सकती हैं। इससे रिफाइनरियों को खरीद के मामले में ज्यादा विकल्प मिलेंगे।
भारत अपनी कच्चे तेल की करीब 90 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी करता है। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों से तेल की उपलब्धता और उसकी कुल लागत रिफाइनरियों के कारोबार के लिए बेहद अहम है। इसलिए रूस और मध्य पूर्व से तेल खरीद का फैसला केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बजाय कीमतों और आपूर्ति की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किए जाने की संभावना है।
रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद बदला वैश्विक तेल कारोबार
फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद वैश्विक तेल कारोबार का स्वरूप बदल गया था। पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए। यूरोपीय संघ ने समुद्री रास्ते से रूसी कच्चे तेल के आयात पर रोक लगाई और जी-7 देशों ने रूसी तेल की कीमतों पर सीमा तय की।
यूरोपीय खरीदारों के रूसी तेल से दूरी बनाने के बाद मॉस्को ने दूसरे बाजारों को आकर्षित करने के लिए भारी छूट देना शुरू किया। भारत इसका बड़ा खरीदार बनकर उभरा। युद्ध से पहले रूस से भारत का तेल आयात बेहद कम था, लेकिन बाद में कुल कच्चे तेल की खरीद में उसकी हिस्सेदारी बढ़कर चरम पर 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।
रूसी तेल पर भारत को मिलने वाली छूट खत्म
भारतीय रिफाइनरियों ने कीमतों में मिलने वाली छूट के कारण रूसी तेल खरीदना शुरू किया। 2022 के आखिरी महीनों और 2023 की शुरुआत में रूसी यूराल्स कच्चा तेल कई बार ब्रेंट की तुलना में करीब 30 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था। इससे रूस भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया। भारतीय रिफाइनरियों ने पश्चिमी देशों के दबाव के मुकाबले कम कीमत और आपूर्ति की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
अब रूसी तेल पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो गई है। हालांकि, मध्य पूर्व से आपूर्ति में रुकावटों के कारण भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल खरीद जारी रखे हुए हैं। दुबे ने कहा, "रूस से तेल की आपूर्ति इन स्तरों पर मजबूत बनी हुई है, लेकिन नवंबर-दिसंबर में इसमें कमी आ सकती है। काला सागर में हमलों के कारण माल ढुलाई की दरें बढ़ रही हैं, जिससे कुल लागत के आधार पर रूसी तेल कम आकर्षक हो सकता है।"
उन्होंने कहा, "सितंबर-अक्टूबर के दौरान होर्मुज के रास्ते आपूर्ति में सुधार से भारतीय रिफाइनरियों को तेल खरीदने के ज्यादा विकल्प मिले हैं। खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता बाजार हिस्सेदारी वापस पाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल दे रहे हैं। हालांकि, स्थिति अभी भी अस्थिर है। होर्मुज के रास्ते आपूर्ति में दोबारा रुकावट आई तो रिफाइनरियां ज्यादा माल ढुलाई लागत के बावजूद रूसी तेल की ओर लौट सकती हैं।"
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केप्लर के प्रमुख विश्लेषक निखिल दुबे ने एक पोस्ट में बताया कि अक्तूबर में मध्य पूर्व से प्रतिदिन करीब 23 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति हुई, जबकि रूस से आयात लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन रहा।
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भारत को क्यों मिल रहा सस्ता कच्चा तेल?
जहाज से जहाज के बीच तेल स्थानांतरित करने की बढ़ती गतिविधियों से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ज्यादा कच्चा तेल पहुंचाने में मदद मिली। इससे सितंबर और अक्तूबर में खाड़ी देशों से आपूर्ति में सुधार हुआ और भारतीय रिफाइनरियों को तेल खरीदने के लिए अधिक विकल्प मिले।
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दुबे के मुताबिक, नवंबर और दिसंबर में रूस से तेल की आपूर्ति कुछ कम हो सकती है। काला सागर में हमलों के कारण माल ढुलाई की दरें बढ़ रही हैं, जिससे कुल लागत के लिहाज से रूसी तेल कम आकर्षक हो सकता है। वहीं, खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता भारत में अपनी बाजार हिस्सेदारी दोबारा बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल दे रहे हैं।
रूस से तेल खरीदने की भी मिली छूट
हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल की आपूर्ति में फिर कोई रुकावट आती है तो भारतीय रिफाइनरियां परिवहन लागत बढ़ने के बावजूद रूसी तेल की खरीद दोबारा बढ़ा सकती हैं। उन्होंने कहा कि 16 अक्तूबर को ग्राहम एक्ट के तहत दी गई छूट से भी कुछ भारतीय खरीदारों की रूस से तेल खरीदने को लेकर चिंताएं कम हो सकती हैं। इससे रिफाइनरियों को खरीद के मामले में ज्यादा विकल्प मिलेंगे।
भारत अपनी कच्चे तेल की करीब 90 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी करता है। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों से तेल की उपलब्धता और उसकी कुल लागत रिफाइनरियों के कारोबार के लिए बेहद अहम है। इसलिए रूस और मध्य पूर्व से तेल खरीद का फैसला केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बजाय कीमतों और आपूर्ति की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किए जाने की संभावना है।
रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद बदला वैश्विक तेल कारोबार
फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद वैश्विक तेल कारोबार का स्वरूप बदल गया था। पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए। यूरोपीय संघ ने समुद्री रास्ते से रूसी कच्चे तेल के आयात पर रोक लगाई और जी-7 देशों ने रूसी तेल की कीमतों पर सीमा तय की।
यूरोपीय खरीदारों के रूसी तेल से दूरी बनाने के बाद मॉस्को ने दूसरे बाजारों को आकर्षित करने के लिए भारी छूट देना शुरू किया। भारत इसका बड़ा खरीदार बनकर उभरा। युद्ध से पहले रूस से भारत का तेल आयात बेहद कम था, लेकिन बाद में कुल कच्चे तेल की खरीद में उसकी हिस्सेदारी बढ़कर चरम पर 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।
रूसी तेल पर भारत को मिलने वाली छूट खत्म
भारतीय रिफाइनरियों ने कीमतों में मिलने वाली छूट के कारण रूसी तेल खरीदना शुरू किया। 2022 के आखिरी महीनों और 2023 की शुरुआत में रूसी यूराल्स कच्चा तेल कई बार ब्रेंट की तुलना में करीब 30 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था। इससे रूस भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया। भारतीय रिफाइनरियों ने पश्चिमी देशों के दबाव के मुकाबले कम कीमत और आपूर्ति की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
अब रूसी तेल पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो गई है। हालांकि, मध्य पूर्व से आपूर्ति में रुकावटों के कारण भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल खरीद जारी रखे हुए हैं। दुबे ने कहा, "रूस से तेल की आपूर्ति इन स्तरों पर मजबूत बनी हुई है, लेकिन नवंबर-दिसंबर में इसमें कमी आ सकती है। काला सागर में हमलों के कारण माल ढुलाई की दरें बढ़ रही हैं, जिससे कुल लागत के आधार पर रूसी तेल कम आकर्षक हो सकता है।"
उन्होंने कहा, "सितंबर-अक्टूबर के दौरान होर्मुज के रास्ते आपूर्ति में सुधार से भारतीय रिफाइनरियों को तेल खरीदने के ज्यादा विकल्प मिले हैं। खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता बाजार हिस्सेदारी वापस पाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल दे रहे हैं। हालांकि, स्थिति अभी भी अस्थिर है। होर्मुज के रास्ते आपूर्ति में दोबारा रुकावट आई तो रिफाइनरियां ज्यादा माल ढुलाई लागत के बावजूद रूसी तेल की ओर लौट सकती हैं।"