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यूजीसी समता नियम: समीक्षा के लिए समिति बनाएगी केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद क्यों बढ़ा विवाद?

Thu, 05 Nov 2026 05:13 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Thu, 05 Nov 2026 05:13 PM IST
सार

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए यूजीसी के 2026 समता नियमों पर पुनर्विचार के लिए एक विशेष समिति का गठन कर रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने हर छात्र के कल्याण को सर्वोपरि बताते हुए मामले की सुनवाई चार हफ्तों के लिए टाल दी है। सामान्य वर्ग द्वारा नियमों को भेदभावपूर्ण बताए जाने और शीर्ष अदालत द्वारा नियमों पर रोक लगाए जाने के बाद सरकार ने यह समीक्षा प्रक्रिया शुरू की है।
 

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centre tells sc special committee ugc 2026 equity regulations review
यूजीसी समता नियम - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के 2026 नियमों की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार एक विशेष समिति का गठन करने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र का पक्ष रखते हुए यह जानकारी दी। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार छात्रों की सभी चिंताओं का समाधान करने और यह सुनिश्चित करने के तरीके तलाश रही है कि छात्र समुदाय का कोई भी वर्ग खुद को अलग-थलग, असुरक्षित या आशंकित महसूस न करे।
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शीर्ष अदालत ने छात्रों के हितों पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए हर छात्र के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता पर बल दिया और सभी याचिकाओं की सुनवाई को चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि विचार-विमर्श के केंद्र में युवा पीढ़ी की चिंताएं, कल्याण और उनकी भलाई होनी चाहिए। यह पूरा मामला 'अबेदा सलीम तड़वी बनाम भारत संघ' और उससे जुड़ी याचिकाओं के तहत अदालत के सामने आया है। यह मूल याचिका 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर की गई थी, जिन्होंने परिसरों में कथित जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी।
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पुराने नियमों को बदलने पर क्यों शुरू हुई कानूनी लड़ाई?
यूजीसी ने 2012 के पुराने ढांचे को बदलते हुए व्यापक विचार-विमर्श के बाद जनवरी में '2026 विनियम' अधिसूचित किए थे। हालांकि, जनवरी में ही सुप्रीम कोर्ट ने इन नए 2026 नियमों पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि ये प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग किया जा सकता है। अदालत ने तब निर्देश दिया था कि अंतरिम अवधि के दौरान 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। इसके बाद केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में भी अदालत को सूचित किया था कि इन नए नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है।
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नए नियमों की किस परिभाषा पर खड़ा हुआ विवाद?
विवाद की मुख्य वजह नियम 3(1)(c) के तहत 'जाति-आधारित भेदभाव' की दी गई परिभाषा बनी, जिसमें मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार को शामिल किया गया था। सामान्य वर्ग के याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह ढांचा एकतरफा और भेदभावपूर्ण है, जो गैर-आरक्षित श्रेणी के छात्रों के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ, याचिकाकर्ताओं के दूसरे समूह ने तर्क दिया कि परिसरों में लक्षित सुरक्षा और कड़े नियमों का होना बेहद जरूरी है।

सरकार के इस कदम का आगे क्या असर होगा?
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार इस नियमन के तहत किसी भी वर्ग में असंतोष नहीं रहने देना चाहती। समिति के गठन के बाद अब 2026 के नियमों में आवश्यक संशोधनों और संतुलन पर काम किया जाएगा ताकि आरक्षित और गैर-आरक्षित दोनों वर्गों के हितों का संतुलन बना रहे। उन्होंने कहा कि सरकार एक समिति नियुक्त करने पर विचार कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छात्र समुदाय का कोई भी वर्ग इस नियामक ढांचे के तहत खुद को असुरक्षित या आशंकित महसूस न करे। चार हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर दोबारा सुनवाई होगी, जिसमें केंद्र सरकार अपनी नई समिति और समीक्षा प्रक्रिया की प्रगति रिपोर्ट पेश कर सकती है।
 
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