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Rampur Bushahar News: जागरे में मशालें जलीं, महासू के देवगीत गूंजे
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रोहड़ू के गांवों में देर रात तक चला पारंपरिक जागरा, महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने भी लिया हिस्सा
महासू देवता के समक्ष शीश नवाकर परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। चतुर्थी के अवसर पर सोमवार को रोहड़ू क्षेत्र के गांवों में पारंपरिक जागरा आयोजित किया गया। शाम होते ही मंदिरों में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। मंदिरों में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद महासू देवता के गीत गाए गए।
पूजा-अर्चना के बाद मंदिर प्रांगण में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर मशालें जलाई गईं। इसके बाद देव गीतों का गायन शुरू हुआ। लोकधुनों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन से देर शाम तक मंदिर परिसर का वातावरण भक्तिमय बना रहा। जागरा में बुजुर्गों के साथ महिलाएं, युवा और बच्चे भी शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने महासू देवता के समक्ष शीश नवाकर परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
चतुर्थी पर क्षेत्र के अलग-अलग गांवों में एक साथ जागरा होने से मंदिरों में विशेष चहल-पहल रही। स्थानीय देव परंपरा और रीति-रिवाजों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान किए गए। शाम से शुरू हुए कार्यक्रम देर रात तक चलते रहे। वहीं, शुराचली क्षेत्र के कई गांवों में जागरा पंचमी के दिन आयोजित किया जाता है।
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स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार जागरा क्षेत्र की प्राचीन देव संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक आयोजन के साथ यह ग्रामीणों को अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़े रखने का माध्यम भी है। जागरा में गाए जाने वाले पारंपरिक देव गीतों में महासू देवता की महिमा के साथ क्षेत्र की लोक संस्कृति की झलक मिलती है।
ग्रामीणों का कहना है कि जागरा में गांव के बुजुर्गों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। आधुनिक दौर में भी ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने में मदद करते हैं। चतुर्थी पर हुए जागरा में लोगों की आस्था, देव परंपरा और आपसी भाईचारे का संगम देखने को मिला।
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महासू देवता के समक्ष शीश नवाकर परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। चतुर्थी के अवसर पर सोमवार को रोहड़ू क्षेत्र के गांवों में पारंपरिक जागरा आयोजित किया गया। शाम होते ही मंदिरों में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। मंदिरों में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद महासू देवता के गीत गाए गए।
पूजा-अर्चना के बाद मंदिर प्रांगण में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर मशालें जलाई गईं। इसके बाद देव गीतों का गायन शुरू हुआ। लोकधुनों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन से देर शाम तक मंदिर परिसर का वातावरण भक्तिमय बना रहा। जागरा में बुजुर्गों के साथ महिलाएं, युवा और बच्चे भी शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने महासू देवता के समक्ष शीश नवाकर परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
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चतुर्थी पर क्षेत्र के अलग-अलग गांवों में एक साथ जागरा होने से मंदिरों में विशेष चहल-पहल रही। स्थानीय देव परंपरा और रीति-रिवाजों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान किए गए। शाम से शुरू हुए कार्यक्रम देर रात तक चलते रहे। वहीं, शुराचली क्षेत्र के कई गांवों में जागरा पंचमी के दिन आयोजित किया जाता है।
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स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार जागरा क्षेत्र की प्राचीन देव संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक आयोजन के साथ यह ग्रामीणों को अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़े रखने का माध्यम भी है। जागरा में गाए जाने वाले पारंपरिक देव गीतों में महासू देवता की महिमा के साथ क्षेत्र की लोक संस्कृति की झलक मिलती है।
ग्रामीणों का कहना है कि जागरा में गांव के बुजुर्गों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। आधुनिक दौर में भी ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने में मदद करते हैं। चतुर्थी पर हुए जागरा में लोगों की आस्था, देव परंपरा और आपसी भाईचारे का संगम देखने को मिला।