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हस्तकला: मशीनों की चमक में फीकी पड़ रही पारंपरिक कारीगरी, रोजी-रोटी बचाने में जुटे हिमाचल प्रदेश के कारीगर

Sun, 01 Nov 2026 12:39 PM IST
Ankesh Dogra गौरीशंकर, कुल्लू।
गौरीशंकर, कुल्लू। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 01 Nov 2026 12:39 PM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा मेले में पारंपरिक लकड़ी और लोहे के उत्पाद बनाने वाले कारीगरों को इस बार भी बिक्री की उम्मीद के मुताबिक ग्राहक नहीं मिल रहे। मशीनी और प्लास्टिक से बनी सस्ती वस्तुओं की बढ़ती मांग ने उनके पुश्तैनी कारोबार को प्रभावित किया है। पढ़ें पूरी खबर...

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Traditional Handmade Crafts Losing Buyers at International Kullu Dussehra Fair
कुल्लू दशहरा में हाथों से बने सामान को नहीं मिल रहे खरीदार - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

मशीनीकरण के बढ़ते चलन ने परंपरागत लकड़ी और लोहे की वस्तुएं बनाने वाले कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में इस बार भी इन कारीगरों ने अपने हाथों से तैयार किए उत्पाद बिक्री के लिए सजाए, लेकिन ग्राहकों की अपेक्षित रुचि नहीं मिलने से उन्हें निराशा हाथ लगी है। परंपरागत कारोबार से जुड़े कारीगरों का कहना है कि अब यह काम घाटे का सौदा बनता जा रहा है। इसके बावजूद वे अपने पुश्तैनी हुनर और कारोबार को जिंदा रखने की कोशिश में जुटे हैं। बाजार में मशीनी और प्लास्टिक से बनी वस्तुओं की बढ़ती मांग के बीच उनके लिए अपने पारंपरिक काम को बचाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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कारीगरों का कहना है कि लकड़ी से बनी रसोई और रोजमर्रा के इस्तेमाल की अन्य वस्तुएं पर्यावरण के अनुकूल होती हैं। इनके इस्तेमाल से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता, जबकि इनकी जगह बाजार में तेजी से बिक रही प्लास्टिक की वस्तुएं पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हैं। इसके बावजूद सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने वाली मशीनी वस्तुओं के आगे पारंपरिक उत्पादों की मांग लगातार प्रभावित हो रही है। ऐसे में कारीगर आर्थिक चुनौतियों के बावजूद अपनी पीढ़ियों से चली आ रही कला और हुनर को बचाने में जुटे हैं।

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लोहे और लकड़ी से बनी वस्तुओं पर मशीनों का प्रभाव पड़ रहा है। इससे इन वस्तुओं की खरीदारी में कमी आई है। हम इस कारोबार को जिंदा रखना चाहते हैं। हमारे दादा-परदादा के समय से यह काम चल रहा। दशहरा उत्सव में सामान लगाया है जिसमें ढोल नगाड़े, सहित कृषि कार्य और रसोई में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं भी शामिल है। -ओम पाल, दुकानदार, थाची



दशहरा मेले में परंपरागत वस्तुओं का कारोबार उतना अधिक नहीं हो रहा है जिसकी उम्मीद की थी। इसकी खरीददारी बहुत कम हो गई है। हमें इस काम को करते हुए 40 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। दशहरा मेले में हमने ढोल-नगाड़े, सहित अन्य रोजमर्रा का सामान लगा रखा है लेकिन इन वस्तुओं के खरीदार अब गिने चुने ही रह गए हैं। -चेतरी देवी, कारीगर, पनारसा

पंद्रह वर्षों से दशहरा मेले में परंपरागत वस्तुओं की दुकान लगाता आ रहा हूं। इसको खरीदने का रुझान लोगों में लगातार कम होता जा रहा है। लकड़ी से बनी वस्तुएं पर्यावरण के लिए भी काफी फायदेमंद होती हैं लेकिन लोग सस्ता खरीदने के चक्कर में प्लास्टिक की बनी वस्तुओं को खरीदने में प्राथमिकता दे रहे हैं। -देवेंद्र कुमार, कारोबारी, बजौरा
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