फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Kullu News ›   Kullu Dussehra Old Traditions According to Elders

हिमाचल प्रदेश: वक्त के साथ कितना बदल गया कुल्लू दशहरा? बुजुर्गों ने बताई पुरानी कहानी; परंपराएं पीछे छूटीं?

Fri, 23 Oct 2026 09:51 AM IST
Ankesh Dogra गौरीशंकर, कुल्लू।
गौरीशंकर, कुल्लू। Published by: Ankesh Dogra Updated Fri, 23 Oct 2026 09:51 AM IST
सार

कुल्लू दशहरा उत्सव ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं। बुजुर्गों के अनुसार, पहले देव समाज के लोग घर से राशन और बिस्तर लेकर आते थे और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उत्सव मनाते थे। आज सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन देव संस्कृति, पारंपरिक पहनावे और नाटी के बदलते स्वरूप को लेकर चिंता भी बढ़ी है। पढ़ें विस्तार से...

विज्ञापन
Kullu Dussehra Old Traditions According to Elders
बुजुर्गों की जुबानी, पुराने कुल्लू दशहरे की कहानी। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में चलने वाला कुल्लू का दशहरा उत्सव यूं ही अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचा....इस सफर में उत्सव ने कई उतार चढ़ाव और बदलाव देखे हैं। कुल्लू दशहरा उत्सव में पहुंचे 70 से 80 वर्ष तक के बुजुर्गों का कहना है कि उत्सव में कई अच्छे बदलाव भी आए हैं और कई बदलाव हमारी संस्कृति के लिए ठीक नहीं है इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

विज्ञापन


Trending Videos

उनका कहना है कि एक समय ऐसा भी था जब देव संस्कृति का निर्वाहन करने के लिए देव समाज के लोग अपने घरों से ही उत्सव के लिए राशन और बिस्तर घर से लेकर आते थे और यहां खुले आसमान तले देव परंपरा का निर्वाहन करते थे। तब देवी देवताओं की भागीदारी भी कम हुआ करती थी और भीड़-भाड़ भी नहीं होती थी। लेकिन धीरे धीरे सरकारी सहायता मिलने लगी और देवी-देवता की भागीदारी भी बढ़ती गई। हालांकि यह पहलु देव संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अच्छा है। लेकिन दूसरी तरफ पहनावे के बदलते स्वरूप से संस्कृति प्रभावित हो रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन

देवी देवताओं और हारियानों को सरकार की ओर सुविधाएं मिल रही है जो अच्छा कदम है। लेकिन देव संस्कृति में संस्कार कम होते जा रहे हैं इस पर ध्यान देने की जरूरत है। चाहे देवी देवताओं के पास जाने की बात हो तो पहले हर व्यक्ति टोपी पहनकर देवता के पास जाकर आशीर्वाद लेता था लेकिन अब इस तरह के संस्कार कम हो गए हैं। - सत्य देव नेगी, 85 वर्ष, बंजार।
विज्ञापन

मेरी उम्र 70 वर्ष हो चुकी है और उस समय मैं 20 वर्ष का था जब दशहरा उत्सव में पहली बार आया था। तब और अब के दशहरा उत्सव में काफी बदलाव हुआ है। उस समय सुविधाएं कम होती थी और लोग सिर्फ देव संस्कृति से जुडे़ होने के कारण उत्सव में आते थे। इसलिए भीड़-भाड़ भी कम हुआ करती थी। लेकिन अब सुविधां बढ़ गई है इस कारण लोगों के आने का चलन बढ़ गया है। -लीलाधर, सैंज घाटी।

दशहरा उत्सव देखते हुए 50 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है उन दिनों देव परंपराओं में रथयात्रा, जलेब परंपरा आदि की देव रिवायत ही हुआ करती थी। देव शिविरों के बाहर लोग रातभर नाटी लगाते थे। लेकिन अब परंपरागत नाटी नहीं लगती और इसने अब आधुनिक कार्यक्रमों का रूप ले लिया है।-खीम दास, डोभी

दशहरा उत्सव अब भीड़ का उत्सव बनता जा रहा है। हालांकि पहले परंपरागत ठेठ संस्कृति के निर्वाहन का केंद्र होता था लेकिन धीरे-धीर परंपरागत संस्कृति में हालांकि कमी होती दिख रही है। लेकिन देव समाज के लोगों को सुविधाएं जरूर मिली है। जबकि पहले अपने घर से ही खाने-पीने का सामान और सोने के लिए बिस्तर लाने पड़ते थे। - तेजा सिंह, जिभी

सरकारी सहयोग ने देव समाज के लोगों के लिए ठाठ-बाठ तो उपलब्ध करवाई है जो सुखद बात है लेकिन दशहरा उत्सव की मूल संस्कृति भी प्रभावित न हो इस पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत है।- चुन्नी लाल, सीस।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed