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अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस: पहाड़ की आर्थिकी की धुरी है नारी शक्ति, खेत से बाजार तक संभाल रहीं मोर्चा

Thu, 15 Oct 2026 06:15 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 15 Oct 2026 06:15 AM IST
सार

प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली धुरी महिलाएं हैं। घर की जिम्मेदारियों से लेकर खेतों, सेब के बगीचों और पशुशालाओं तक उनकी मेहनत परिवारों की आजीविका को सहारा दे रही है। 

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International Day of Rural Women: Women power is the backbone of the mountain economy
इंदिरा मेहता। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली धुरी महिलाएं हैं। घर की जिम्मेदारियों से लेकर खेतों, सेब के बगीचों और पशुशालाओं तक उनकी मेहनत परिवारों की आजीविका को सहारा दे रही है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच महिलाएं कृषि और पशुपालन में श्रम देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाकर सीधे कमाई भी कर रही हैं। उनकी यह भागीदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भूमिका को दर्शाती है। कुल्लू में महिलाएं रोजाना खेतों से सब्जियां लेकर बाजार पहुंचती हैं। मंडी के सेरी मंच पर महिलाएं पत्तल, अरबी और सब्जियां बेचती हैं। शिमला जिले के रामपुर में चाटी पुल पार से महिलाएं सब्जियां, दूध और छाछ लेकर आती हैं। धर्मशाला, पालमपुर, नगरोटा बगवां और आसपास के क्षेत्रों में भी महिलाएं अपने उत्पाद बेचकर परिवार की आय बढ़ा रही हैं। खेतों में फसल उगाने से लेकर उसे बाजार में बेचने तक की जिम्मेदारी निभाकर वे परिवार की आर्थिक जरूरतों में सीधा योगदान दे रही हैं।

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बागवानी से पशुपालन तक महिलाओं की अहम भूमिका
महिलाएं सेब के बगीचों में फसल के तुड़ान और ग्रेडिंग से लेकर पशुओं के लिए चारा जुटाने, उनकी देखभाल और दूध निकालने तक महिलाएं अहम भूमिका निभाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी जोतों और पुरुषों के रोजगार के लिए बाहर जाने के बीच कृषि और पशुपालन की जिम्मेदारियां भी महिलाओं पर बढ़ी हैं। प्राकृतिक खेती और स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं के लिए कमाई के नए रास्ते खोले हैं। समूहों के माध्यम से महिलाएं प्राकृतिक खाद तैयार करने के साथ फल और सब्जियां बेच रही हैं। इससे उन्हें अपनी मेहनत का सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है और परिवार की आय में योगदान देने के अवसर बढ़ रहे हैं।

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महिला श्रम बल भागीदारी में हमीरपुर देश में अव्वल
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के मामले में हमीरपुर जिला देशभर में पहले स्थान पर रहा है। यहां 15 वर्ष और इससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम बल सहभागिता दर 80.9 फीसदी दर्ज की गई, जबकि महिला श्रमिक जनसंख्या अनुपात 80 फीसदी रहा। ये आंकड़े ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी को रेखांकित करते हैं।

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ताजी सब्जियां बेचकर महीने में कमा रहीं 15 हजार रुपये
मंडी जिले के करसोग की ग्राम लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की सदस्य सुनीता देवी बताती हैं कि प्राकृतिक खेती ने उन्हें खाद और दवाओं के लिए बाजार पर निर्भर रहने से काफी हद तक बचाया है। वे खुद जीवामृत तैयार करती हैं और ताजी सब्जियां बेचकर हर महीने 10 से 15 हजार रुपये तक कमाती हैं।

महिलाओं के श्रम पर टिकी है ग्रामीण अर्थव्यवस्था
ग्रामीण हिमाचल में घर और खेत अलग-अलग इकाइयां नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएं हैं। छोटी जोतों और पुरुषों के पलायन के बीच खेती, बागवानी और पशुपालन की जिम्मेदारियां महिलाओं के कंधों पर बढ़ी हैं। महिलाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनके श्रम और आर्थिक योगदान को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को मजबूत बनाने के लिए उनके काम की पहचान, आर्थिक योगदान का उचित मूल्यांकन और बाजार तक उनकी पहुंच बढ़ाना जरूरी है। -डॉ. रुचि रमेश, प्राचार्य, दाड़लाघाट कॉलेज और समाजशास्त्री

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