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हिंदी भारतीयता की आत्मा, इसके बिना संस्कृति का भवन अधूरा : डॉ. संतराम देशवाल

Mon, 14 Sep 2026 02:38 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Mon, 14 Sep 2026 02:38 AM IST
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Hindi is the soul of Indianness; without it, the edifice of culture remains incomplete: Dr. Santram Deshwal.
फोटो : पद्मश्री डॉ. संतराम देशवाल
सोनीपत। हिंदी दिवस केवल भाषा के महत्व को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और सामूहिक चेतना को समझने का दिन भी है। महाकवि सूरदास साहित्य साधना पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त प्रोफेसर पद्मश्री डॉ. संतराम देशवाल का मानना है कि हिंदी के बिना भारतीय संस्कृति का भवन अधूरा है। उनके अनुसार हिंदी संवाद का माध्यम भर नहीं, बल्कि भारतीयता की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है।
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डॉ. देशवाल कहते हैं कि राजभाषा हिंदी को उसका गौरव दिलाना सामूहिक जिम्मेदारी है। बदलते समय में हिंदी की लगातार उपेक्षा से नई पीढ़ी अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो सकती है। भारत विभिन्न भाषाओं, बोलियों और लोक संस्कृतियों का देश है। हिंदी ने भी अलग-अलग कालखंडों में यहां आई भाषाओं और संस्कृतियों से अनेक शब्द ग्रहण किए, लेकिन संपर्क और व्यवहार की भाषा के रूप में उसका अपना महत्वपूर्ण स्थान बना रहा।
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मुगलकाल में भी बनी रही जनभाषा
डॉ. देशवाल ने कहा अपने उद्भव काल से ही भारत में संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होती रही है। मुगलकाल में फारसी राजभाषा होने के बावजूद आम बोलचाल में हिंदी का प्रभाव कायम रहा। अमीर खुसरो का हिंदी के प्रति लगाव भी इसकी व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
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साहित्य साधना से हिंदी की सेवा
डॉ. संतराम देशवाल लंबे समय से हिंदी के प्रचार-प्रसार और साहित्य के विकास के लिए सक्रिय हैं। उन्होंने कोलकाता, बड़ोदरा, इंदौर, भोपाल, मुंबई, जम्मू-कश्मीर और सोलन समेत देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशनों और कार्यशालाओं में भाग लेकर हिंदी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया है।

उनकी साहित्य साधना में हिंदी और भारतीय संस्कृति प्रमुख विषय रहे हैं। ‘इक्कीसवीं सदी के ललित निबंध’, ‘लोक पथ’, संस्कृति स्वरूप एवं भूमंडलीकरण’, ‘आंगन में मोर नाचा किसने देखा’, ‘लोक-आलोक’, ‘हरियाणा : संस्कृति एवं कला’, ‘हिंदी ललित निबंध’ और ‘संस्मरण’ सहित उनकी 30 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें महाकवि सूरदास आजीवन साधना सम्मान, लोक साहित्य शिरोमणि सम्मान और लोक कवि मेहर सिंह पुरस्कार समेत एक दर्जन से अधिक सम्मान मिल चुके हैं।
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