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दिल्ली दंगा मामला: भजनपुरा पेट्रोल पंप हिंसा के दोषियों को दो साल का कठोर कारावास, अदालत ने सुनी पूरी दास्तान

Fri, 25 Sep 2026 03:26 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन राजपूत, नई दिल्ली
नितिन राजपूत, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 25 Sep 2026 03:26 AM IST
सार

भजनपुरा दंगे में पांच दोषियों को सजा सुनाते समय कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह की अदालत के सामने सिर्फ अपराध की गंभीरता ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी से जुड़ी कई परिस्थितियां भी थीं।

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Delhi Riots Case: Convicts in Bhajanpura Petrol Pump Violence Sentenced to Two Years of Rigorous Imprisonment
प्रतीक चित्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कड़कड़डूमा कोर्ट में दिल्ली दंगों के दौरान भजनपुरा इलाके में पेट्रोल पंप के पास हुई हिंसा के मामले में पांच दोषियों को सजा सुनाई गई है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह की अदालत ने अलग-अलग धाराओं में दोषी अरिफ, मोहम्मद खालिद, अब्दुल सत्तार, तनवीर अली और हुनैन को अधिकतम 2-2 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही, प्रत्येक पर 13,500 का जुर्माना लगाया। इससे पहले अदालत ने पांच दोषियों को दंगा करने, गैर-कानूनी भीड़ का हिस्सा बनने, सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिस पर हमला करने का दोषी ठहराया था।

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सजा पर बहस के दौरान राज्य की ओर से विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) ने दोषियों को अधिकतम सजा देने की मांग की। अभियोजन ने कहा कि दोषियों ने पुलिसकर्मियों पर हिंसक तरीके से हमला किया, जबकि पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी कर रहे थे। लिखित दलील में कहा कि यह घटना सामाजिक व्यवस्था और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती थी। पुलिसकर्मियों को उस समय निशाना बनाया गया, जब वे दंगे को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे। अभियोजन ने कहा कि भीड़ ने वर्दी में मौजूद पुलिस अधिकारियों पर पत्थर फेंके और सरकारी कर्मचारियों को उनके कर्तव्यों का पालन करने से स्वेच्छा से रोका। अभियोजन के अनुसार, इस घटना से भय और अराजकता का माहौल पैदा हुआ। राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि किसी एक दोषी के खिलाफ अलग-अलग हिंसक कृत्य को साबित नहीं किया जाना उनकी सामूहिक आपराधिक जिम्मेदारी को कम नहीं करता।
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53 लोगों मारे गए थे, 26 ने दी गवाही : मामला भजनपुरा थाने में एएसआई अरविंद कुमार की शिकायत पर दर्ज हुआ था। शिकायत के अनुसार, 24 फरवरी 2020 को दोपहर करीब एक बजे पुलिस टीम नूरे इलाही क्षेत्र में तैनात थी। करीब दो बजे सूचना मिली कि भजनपुरा पेट्रोल पंप के पास बड़ी संख्या में लोग जुट रहे हैं। पुलिस का दावा था कि करीब 100 से 150 लोगों की भीड़ सीएए और एनआरसी के विरोध में नारेबाजी करते हुए डिवाइडर तोड़कर पेट्रोल पंप की ओर बढ़ी। भीड़ पर पथराव करने, पुलिसकर्मियों से हाथापाई करने और पेट्रोल पंप की मशीनों में तोड़फोड़ कर आग लगाने के आरोप लगाए गए थे। वाहनों और दुकानों को भी आग के हवाले करने का आरोप था। मामले में मुख्य जांच अधिकारी एसआई मोहित कुमार समेत कुल 26 गवाह अदालत में पेश किए गए। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोग मारे गए थे और करीब दो सौ लोग घायल हो गए थे।
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पुलिसकर्मियों के बयानों को माना था विश्वसनीय : अदालत ने एएसआई अरविंद, सेवानिवृत्त एएसआई वेदपाल, सेवानिवृत्त हेड कांस्टेबल अरविंद, हेड कांस्टेबल जगरूप और कांस्टेबल नेमी चंद के बयानों को विश्वसनीय माना। प्रिंस डिजिटल स्टूडियो के संचालक प्रेम सिंह और कैमरामैन अमित शाक्य द्वारा रिकार्ड किए गए वीडियो और तस्वीरों से भी स्थानीय निवासी जगरूप की मौके पर मौजूदगी की पुष्टि हुई। जगरूप ने अदालत में पांच आरोपियों की पहचान भीड़ के सक्रिय सदस्यों के रूप में की। अदालत ने माना था कि भीड़ साझा मकसद से जुटी थी और उसने पुलिसकर्मियों पर भारी पथराव किया, जिसके कारण पुलिसकर्मियों को दीवार फांदकर जान बचानी पड़ी। इसी आधार पर पांचों को दंगा और पुलिस पर आपराधिक बल प्रयोग का दोषी माना गया था।

सजा तय करते वक्त कोर्ट ने सुनी दोषियों की पूरी कहानी
भजनपुरा दंगे में पांच दोषियों को सजा सुनाते समय कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह की अदालत के सामने सिर्फ अपराध की गंभीरता ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी से जुड़ी कई परिस्थितियां भी थीं। किसी की मासिक कमाई 8 हजार रुपये थी तो कोई सड़क किनारे नाश्ते की दुकान चलाकर परिवार पाल रहा था। किसी के परिवार में चार लोग उस पर निर्भर थे तो किसी पर पांच सदस्यों की जिम्मेदारी थी। अदालत ने इन सभी पहलुओं को सजा तय करते समय ध्यान में रखा।

न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलों का विश्लेषण करते हुए माना कि राज्य मशीनरी पर सीधा हमला होने के कारण मामले को हल्के में नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि ऐसे अपराधों में समाज के लिए एक कड़ा संदेश होना जरूरी है। लेकिन, इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ये सभी पहली बार अपराध में शामिल हुए हैं। अपने-अपने परिवारों के अकेले कमाने वाले हैं और घटना के बाद से किसी अन्य अपराध में शामिल नहीं रहे। अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट के मुताबिक, आरिफ ने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की है और निजी नौकरी से करीब 15 हजार रुपये महीने कमाता था। उसके परिवार में पांच सदस्य हैं और चार लोग उस पर निर्भर हैं।

कटघरे की सच्चाई...कोई रेहड़ी लगाता था, तो कोई मजदूरी कर पालता था बीमार मां को
बचाव पक्ष और अदालत द्वारा मंगाई गई सामाजिक-आर्थिक स्थिति ने इन पांचों दोषियों की एक बेहद कमजोर और लाचार तस्वीर पेश की। आरिफ चौथी तक पढ़ा है और 15 हजार रुपये महीने की निजी नौकरी से 5 सदस्यों का परिवार चलाता था। हुनैन और तनवीर पांचवीं पास हैं और 10 से 12 हजार रुपये की दिहाड़ी मजदूरी करते थे। हुनैन पर कर्ज का बोझ है और वह अपनी दमा (अस्थमा) पीड़ित मां का इकलौता सहारा है। साथ ही, अब्दुल सत्तार और मोहम्मद खालिद अनपढ़ हैं। इसके अलावा, सत्तार सड़क किनारे नाश्ते व स्नैक्स की रेहड़ी लगाकर अपने छह सदस्यीय परिवार का पेट भरता था, जबकि खालिद महज 8 हजार रुपये की मजदूरी करता था।

पक्ष की दलील, कानून के रखवालों पर हमला राज्य को चुनौती
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दोषियों को कानून में तय अधिकतम सजा देने की पुरजोर मांग की थी। विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (तहसीन पूनावाला, सेवक पेरुमल और धनंजय चटर्जी केस) का हवाला देते हुए दलील दी थी कि यह कोई सामान्य दंगा नहीं था, बल्कि वर्दीधारी पुलिसकर्मियों पर एक सुनियोजित हमला था। अभियोजन का कहना था कि जब भीड़ कानून के रक्षकों को ही लाचार कर दे और ऐसे मामलों में नरमी बरती जाए, तो समाज में अराजक तत्वों के हौसले बुलंद होते हैं। भीड़ में शामिल हर व्यक्ति की व्यक्तिगत भूमिका अलग से साबित न होने पर भी उसकी आपराधिक जिम्मेदारी कम नहीं आंकी जा सकती।


दो साल की सजा सुनते ही कोर्ट रूम में छा गया सन्नाटा
बृहस्पतिवार को भजनपुरा दंगा मामले में जैसे ही अदालत ने पांचों दोषियों को सजा सुनाई, वैसे ही माहौल गंभीर हो गया। मामले में दोषी ठहराए गए अरिफ, मोहम्मद खालिद, अब्दुल सत्तार, तनवीर अली और हुनैन के लिए सजा का यह ऐलान अहम था।

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