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दिल्ली दंगे: ताहिर हुसैन को एक और मामले में सजा, कोर्ट ने कहा- निर्देश देने वाला भी हिंसा करने जितना दोषी

Fri, 16 Oct 2026 08:46 PM IST
Rahul Kumar Tiwari एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली Published by: Rahul Kumar Tiwari Updated Fri, 16 Oct 2026 08:46 PM IST
सार

उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के 2020 के मामले में अदालत ने आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि जनप्रतिनिधि के पद का इस्तेमाल हिंसा रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देने में हुआ।

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Court sentences former councillor Tahir Hussain to two years in prison in Delhi riots case
कोर्ट से बाहर निकलता ताहिर हुसैन (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को टिप्पणी की कि 'हिंसा का निर्देश देने वाला हाथ भी उतना ही दोषी है, जितना उसे अंजाम देने वाला हाथ।' अदालत ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े एक मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में उनका पद और हिंसा को बढ़ावा देने के लिए उनके घर का इस्तेमाल, अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण परिस्थितियां थीं।

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कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने ताहिर हुसैन पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से बताई गई अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाली परिस्थितियां, बचाव पक्ष की ओर से सजा कम करने के लिए पेश की गई परिस्थितियों पर काफी भारी पड़ीं।
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16 अक्तूबर को जारी सजा संबंधी आदेश में अदालत ने कहा कि सांप्रदायिक तनाव के माहौल में ताहिर हुसैन से उम्मीद थी कि वह लोगों को हिंसा से रोकने और शांति एवं सद्भाव बनाए रखने की दिशा में काम करेंगे। इसके उलट, अदालत ने पाया कि वह दंगों को बढ़ावा देने के दोषी थे। उन्होंने अपना घर उपलब्ध कराया, जिसे इलाके का सबसे ऊंचा स्थान बताया गया। वहां से दंगाई लोगों पर हमला कर सकते थे और संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते थे।

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अदालत ने कहा, 'इस प्रकार, जिस पद का इस्तेमाल हिंसा रोकने के लिए किया जाना चाहिए था, इस मामले में उसका इस्तेमाल हिंसा को बढ़ावा देने के लिए किया गया।' अदालत ने कहा कि उनका यह आचरण अपराध की गंभीरता के अनुरूप सजा देने और भविष्य में ऐसे कृत्यों को रोकने के लिए दंड को निवारक बनाने की मांग करता है।

ताहिर हुसैन को 10 अक्तूबर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147 के साथ धारा 109 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था। ये धाराएं दंगा करने और दंगे के लिए उकसाने से संबंधित हैं। सजा का यह आदेश दयालपुर थाने में दर्ज प्राथमिकी संख्या 120/2020 से संबंधित है।
 

अभियोजन पक्ष ने मांगी थी अधिकतम सजा
अभियोजन पक्ष ने अदालत से कानून के तहत उपलब्ध अधिकतम सजा देने की मांग की थी। उसने दलील दी कि दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया जा चुका है, इसलिए वह बार-बार अपराध करने वाले व्यक्ति हैं। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि खजूरी खास और करावल नगर रोड इलाके में हिंसा के दौरान ताहिर हुसैन का घर एक प्रमुख केंद्र के रूप में इस्तेमाल हुआ था। वहां से दंगाइयों को आम लोगों पर हमला करने के लिए ऊंचाई और बेहतर स्थिति मिलती थी। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि संबंधित समय में निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाते ताहिर हुसैन की जिम्मेदारी हिंसा को रोकने की थी, न कि उसे बढ़ावा देने की।

बचाव पक्ष ने दी थी ये दलीलें
कठोर सजा की मांग का विरोध करते हुए ताहिर हुसैन के वकील ने दलील दी कि उन्हें आईपीसी की धारा 149 के तहत दोषी नहीं ठहराया गया है और न ही यह पाया गया कि उन्होंने दंगाइयों की भीड़ में शामिल होकर प्रत्यक्ष रूप से हिंसा की थी। बचाव पक्ष ने कहा कि ताहिर हुसैन की ओर से किसी प्रत्यक्ष कृत्य को साबित नहीं किया गया। उन्होंने लगातार दावा किया था कि दंगाइयों ने जबरन उनके घर पर कब्जा कर लिया था।

उनके वकील ने यह भी कहा कि घटना के दौरान ताहिर हुसैन ने पुलिस नियंत्रण कक्ष (पीसीआर) को फोन किया था। बचाव पक्ष के अनुसार, उन्हें दंगाइयों की जानबूझकर मदद करने के बजाय हिंसा को सुविधाजनक बनाने के आधार पर दोषी ठहराया गया था। इसलिए अदालत से उनके प्रति नरम रुख अपनाने का अनुरोध किया गया।

प्रत्यक्ष रूप से हिंसा में शामिल नहीं होना सजा कम करने का आधार नहीं
अदालत ने सजा कम करने के लिए दी गई इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि भीड़ में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होने का तथ्य अपने आप में उस अपराध की गंभीरता को काफी कम नहीं करता, जिसके लिए ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया गया है। अदालत ने टिप्पणी की, 'सिर्फ इस तथ्य से कि अभियोजन पक्ष दोषी की दंगे में सक्रिय भागीदारी साबित नहीं कर पाया, उसके आचरण की गंभीरता कम नहीं हो जाती।'

न्यायाधीश ने ताहिर हुसैन की बेबसी संबंधी दलील को भी सजा कम करने वाली स्थापित परिस्थिति मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ताहिर हुसैन ने बचाव में साक्ष्य पेश करने का विकल्प चुना था, लेकिन न तो वह कथित पीसीआर कॉल किए जाने को साबित कर सके और न ही अपने बचाव के समर्थन में कोई अन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर पाए।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जब उनसे विशेष रूप से पूछा गया कि क्या उन्होंने किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ यह शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके घर पर जबरन कब्जा कर उसका इस्तेमाल दंगा करने और पत्थरबाजी के लिए किया गया, तो इसका जवाब नकारात्मक था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस परिस्थिति से निर्णायक रूप से यह साबित नहीं होता कि घर पर जबरन कब्जा नहीं किया गया था। हालांकि, उसने इसे घटना के बाद ताहिर हुसैन के आचरण से जुड़ा तथ्य माना और कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर इस दलील को सजा कम करने वाली परिस्थिति स्वीकार किया जा सके।

‘सुविधा देने’ का अर्थ यह नहीं कि इरादा नहीं था
अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि ताहिर हुसैन को हिंसा में मदद करने के इरादे के बिना केवल सुविधा उपलब्ध कराने के आधार पर दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि फैसले में ‘सुविधा प्रदान करने’ शब्द के इस्तेमाल भर से आवश्यक आपराधिक मंशा समाप्त नहीं हो जाती। इस तरह के आचरण को अपने आप में कम दोषपूर्ण भी नहीं माना जा सकता।
 

सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट में आय करीब दो लाख रुपये बताई गई
सजा संबंधी आदेश में अदालत ने सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, ताहिर हुसैन ने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। वह विवाहित हैं और उनके परिवार में चार आश्रित सदस्य हैं। उनकी मासिक आय लगभग दो लाख रुपये आंकी गई थी। रिपोर्ट में उनके खिलाफ पहले से नौ मामलों में संलिप्तता का भी उल्लेख किया गया था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि बचाव पक्ष की ओर से सजा कम करने के लिए बताई गई परिस्थितियां साबित नहीं हुईं। इसके विपरीत, अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाली परिस्थितियां उन पर भारी थीं। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं है, जिसके चलते कम सजा दी जाए।

इसके बाद अदालत ने ताहिर हुसैन को दो साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना नहीं भरने पर उन्हें 10 दिन का साधारण कारावास भुगतना होगा। आदेश में कानून के प्रावधानों के अनुसार, पहले से हिरासत में बिताई गई अवधि का सजा में समायोजन करने का लाभ भी दिया गया है।
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