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एआई की दौड़ और सुरक्षा का सवाल: भारत के सामने बड़ी चुनौती, सुरक्षित तकनीक और जवाबदेही का ढांचा भी चाहिए

Fri, 18 Sep 2026 06:28 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Fri, 18 Sep 2026 06:28 AM IST
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सार
एआई को लेकर भारत की महत्वाकांक्षा जायज है। पर, एआई ताकत बनने के लिए जरूरी है कि उसे बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले जटिल सवाल पूछने की क्षमता भी विकसित की जाए।
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एआई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को अक्सर एक ऐसे बड़े मौके के तौर पर पेश किया जाता है, जिसे छोड़ा नहीं जा सकता। यह सरकारी सेवाओं को बेहतर बना सकता है, डॉक्टरों की मदद कर सकता है, शिक्षा में बदलाव ला सकता है, कारोबारों की उत्पादकता बढ़ा सकता है और तकनीकी कंपनियों की एक नई पीढ़ी तैयार कर सकता है। भारत जहां इस बात पर ध्यान दे रहा है कि वह कितनी तेजी से एआई बना और लागू कर सकता है, वहीं दूसरी जगहों पर एक ज्यादा मुश्किल चर्चा जारी है कि ये सिस्टम कितने सुरक्षित हैं, और इनके विफल होने पर कौन जिम्मेदार होगा? हाल के दिनों में, ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी अमेरिकी कंपनियों के प्रमुख अधिकारियों व शोधकर्ताओं ने एआई की दौड़ की रफ्तार और दिशा पर सवाल उठाए हैं।


भारत जैसे देश में, जो अपनी तकनीकी महत्वाकांक्षा दिखाना चाहता है, एआई की सुरक्षा एक अजीब विषय है। यह अमीर देशों से आई एक ऐसी चिंता लग सकती है, जिन्होंने पहले ही शक्तिशाली मॉडल बना लिए हैं और अब अगली पीढ़ी को विनियमित करना चाहते हैं। अपनी बड़ी आबादी, असमान सार्वजनिक सेवाओं और विकास की जरूरतों के कारण, भारत के पास एआई के व्यावहारिक इस्तेमाल पर ध्यान देने के ठोस कारण हैं। भारत में, भरोसे के लायक न होने या ठीक से प्रबंधित न किए जाने वाले एआई के नतीजे बहुत अलग-अलग हो सकते हैं। भारतीय डाटा की कमी पर प्रशिक्षित किया गया कोई सिस्टम तटस्थ और कुशल दिखते हुए भी सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा दे सकता है। एआई से होने वाली धोखाधड़ी, गलत जानकारी और साइबर हमले पहले ही हकीकत बन चुके हैं। ज्यादा स्वायत्त सिस्टम ऐसे नुकसान को और तेज, सस्ता और पता लगाने में मुश्किल बना सकते हैं।


चुनावों पर असर को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की चेतावनी ऐसे देश में अहम है, जहां राजनीतिक चर्चाएं पहले से ही बहुत ज्यादा बंटे हुए डिजिटल नेटवर्क के जरिये होती हैं। इंडिया एआई मिशन में ‘सुरक्षित और भरोसेमंद एआई’ का एक अहम हिस्सा शामिल है और सरकार ‘इंडिया एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट’ बना रही है। देश ने एआई गवर्नेंस से जुड़े दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं और एआई गवर्नेंस की अंतरराष्ट्रीय पहलों में हिस्सा लिया है। लेकिन, ये उपाय अब भी ज्यादातर हल्के-फुल्के और स्वैच्छिक ढांचे पर आधारित हैं। ये स्वतंत्र परीक्षण, लागू करने योग्य जवाबदेही या सार्वजनिक जवाबदेही जैसे नहीं हैं। ब्राजील का प्रस्तावित एआई कानून जोखिम पर आधारित तरीका अपनाता है, जिसमें उन सिस्टम के लिए ज्यादा जिम्मेदारियां तय की गई हैं, जिनसे मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा को ज्यादा जोखिम होता है। ब्राजील स्वैच्छिक सिद्धांतों से आगे बढ़कर बाध्यकारी नियमों की ओर बढ़ना चाह रहा है, जबकि भारत ने एक ऐसा राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया है, जो स्वैच्छिक अनुपालन और उद्योग भागीदारी पर निर्भर है, जबकि सेक्टर के रेगुलेटर ज्यादा मजबूत सरकारी निगरानी की जरूरत बता रहे हैं।

एआई के क्षेत्र में भारत की महत्वाकांक्षा जायज है। लेकिन, कोई देश सिर्फ ज्यादा मॉडल बनाकर, ज्यादा निवेश आकर्षित करके या ज्यादा शिखर सम्मेलन आयोजित करके ही जिम्मेदार एआई ताकत नहीं बन सकता। इसके लिए जरूरी है कि सिस्टम को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले मुश्किल सवाल पूछने की क्षमता भी विकसित की जाए।
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