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सीजी: बैसाखी के सहारे 30 साल से बच्चों का भविष्य संवार रहे दिव्यांग शिक्षक, अब मुख्यमंत्री करेंगे सम्मानित

Sat, 05 Sep 2026 12:23 PM IST
बीजापुर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर Published by: बीजापुर ब्यूरो Updated Sat, 05 Sep 2026 12:23 PM IST
सार

एक पैर से पूरी तरह दिव्यांग होने के बावजूद अगर कोई शिक्षक 30 साल से अधिक समय से बच्चों की शिक्षा को अपना जीवन मिशन बना ले, तो यह सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि समर्पण की मिसाल बन जाती है।
 

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Physically challenged in one leg, yet a teacher is shaping the futures of 32 children through sheer determinat
दिव्यांग शिक्षक बच्चों को पढ़ाते हुए - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीजापुर जिले के भोपालपटनम ब्लॉक के सबसे पुराने प्राथमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक पलनी शेट्टी की ऐसी ही प्रेरक कहानी हैं।वर्ष 1891 में स्थापित भोपालपटनम के ऐतिहासिक प्राथमिक विद्यालय में वे आज भी बैसाखी के सहारे रोज समय पर पहुंचते हैं और 32 बच्चों को पढ़ाते हैं। बारिश हो, आंधी हो या तूफान उन्होंने कभी दिव्यांगता को स्कूल जाने के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।
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शिक्षक दिवस के अवसर पर उनके इसी समर्पण को सम्मान मिलेगा। बीजापुर जिले से प्रधानाध्यापक श्रेणी में उनका चयन मुख्यमंत्री अलंकरण पुरस्कार के लिए हुआ है। जगदलपुर में आयोजित समारोह में उन्हें मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित किया जाएगा।
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कभी नहीं माना खुद को कमजोर
पलनी शेट्टी एक पैर से पूरी तरह दिव्यांग हैं। उनकी नियुक्ति दिव्यांग कोटे से हुई थी। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने आपको कमजोर नहीं माना। पहले वे लूना स्कूटी चलाकर स्कूल पहुंचते थे। अब ऑटोमैटिक कार से विद्यालय आते हैं और बैसाखी के सहारे कक्षा तक पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते हैं। मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं एक पैर से दिव्यांग हूं। बच्चों को पढ़ाना ही मेरा काम नहीं, मेरी जिम्मेदारी है। बारिश, आंधी या तूफान कुछ भी हो, मैं समय पर स्कूल पहुंचने की कोशिश करता हूं।
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पंचायत कर्मी से प्रधानाध्यापक तक का सफर।
पलनी शेट्टी का शिक्षा सेवा का सफर करीब तीन दशक पुराना है।1995-96 में पंचायत कर्मी के रूप में भर्ती हुए,1998 में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 बने,पहली पदस्थापना चिंतावागू नदी पार रामपेटा प्राथमिक स्कूल में हुई।
नदी-नाले पार कर और साइकिल से रोज स्कूल पहुंचते हुए वहां तीन साल तक बच्चों को पढ़ाया।इसके बाद उल्लूर प्राथमिक शाला में सेवाएं दीं।2003 से करीब 20 साल तक बालक आश्रम भोपालपटनम में बच्चों को पढ़ाया।2022-23 में प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नति मिली।इसके बाद उन्हें भोपालपटनम के 1891 में बने सबसे पुराने प्राथमिक विद्यालय की जिम्मेदारी मिली।
आज वे उसी ऐतिहासिक स्कूल में प्रधानाध्यापक के रूप में बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं।

32 बच्चों के लिए रोज बनते हैं प्रेरणा।
स्कूल के 32 बच्चों के लिए पलनी शेट्टी सिर्फ प्रधानाध्यापक नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल हैं। बच्चे रोज उन्हें बैसाखी के सहारे स्कूल आते देखते हैं। इसके बावजूद वे कभी शिकायत नहीं करते। समय पर कक्षा लेते हैं और हर बच्चे की पढ़ाई पर व्यक्तिगत ध्यान देते हैं।स्कूल के बच्चों और सहकर्मियों का कहना है कि गुरुजी की सबसे बड़ी खूबी उनकी संवेदनशीलता और अनुशासन है। वे बच्चों को सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन में कठिनाइयों से हार न मानने की सीख भी देते हैं।


अंग्रेजों के दौर का स्कूल, आज भी शिक्षा की रोशनी।
भोपालपटनम का यह प्राथमिक विद्यालय वर्ष 1891 में स्थापित हुआ था। जिले के सबसे पुराने स्कूलों में शामिल इस विद्यालय ने कई पीढ़ियों को शिक्षा दी है। आज उसी ऐतिहासिक स्कूल की जिम्मेदारी ऐसे शिक्षक के हाथों में है, जिन्होंने अपनी शारीरिक दिव्यांगता को कभी अपने कर्तव्य के आड़े नहीं आने दिया।
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