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अब जासूसी करना नहीं होगा आसान: डीआरडीओ ने किया क्वांटम तकनीक का सफल परीक्षण, कैसे करेगी काम?
Wed, 14 Oct 2026 11:40 AM IST
राकेश कुमार
एएनआई, नई दिल्ली।
एएनआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 14 Oct 2026 11:40 AM IST
सार
डीआरडीओ ने ओडिशा के चंदिपुर में क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक का लाइव नेटवर्क पर सफल परीक्षण किया है। इससे तोपों और बख्तरबंद हथियारों के परीक्षण के दौरान मिलने वाली अहम जानकारियों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। इस तकनीक की खासियत है कि संचार के दौरान जासूसी की कोशिश का पता लगाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल रक्षा के साथ वित्त और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में भी हो सकता है।
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डीआरडीओ ने किया क्वांटम तकनीक का सफल परीक्षण
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक का सफल परीक्षण किया है। डीआरडीओ ने बुधवार को इसकी जानकारी दी। यह परीक्षण ओडिशा के चंदिपुर स्थित प्रूफ एंड एक्सपेरिमेंटल एस्टैब्लिशमेंट (पीएक्सई) के डायनेमिक टेस्ट रेंज के लाइव नेटवर्क पर किया गया। इस सफलता से भारत की सुरक्षित संचार तकनीक विकसित करने की क्षमता को मजबूती मिलेगी।
इस तकनीक से रक्षा क्षेत्र को क्या फायदा होगा?
डीआरडीओ के मुताबिक, इस तकनीक का इस्तेमाल तोपों और बख्तरबंद हथियारों के परीक्षण के दौरान मिलने वाली अहम जानकारियों को सुरक्षित रखने में किया जा सकेगा। इन परीक्षणों के समय मिलने वाले आंकड़ों और टेलीमेट्री से जुड़ी जानकारी को सुरक्षित रखना जरूरी होता है। क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) तकनीक ऐसे आंकड़ों को सुरक्षित रखने में मदद करेगी। इससे रक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा मजबूत हो सकेगी।
क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक क्या है?
क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन एक ऐसी तकनीक है, जिसका इस्तेमाल सुरक्षित संचार के लिए डिजिटल कुंजियां बनाने और साझा करने में किया जाता है। यह क्वांटम भौतिकी के खास गुणों पर काम करती है। इसकी मदद से संचार के दौरान किसी बाहरी व्यक्ति की ओर से जानकारी हासिल करने या जासूसी करने की कोशिश का पता लगाया जा सकता है। डीआरडीओ के मुताबिक, यह तकनीक संचार को सुरक्षित बनाने के साथ किसी की दखलंदाजी का पता लगाने में भी मदद करती है।
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दूसरी तकनीकों से कैसे अलग है क्वांटम क्रिप्टोग्राफी?
क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में भौतिकी के सिद्धांतों और खास तकनीक का इस्तेमाल करके एक लिंक के जरिए जानकारी भेजी जाती है। वैज्ञानिक सिद्धांतों के मुताबिक, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक संचार के दौरान किसी बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी का पता लगा सकती है। यह सुविधा सामान्य क्रिप्टोग्राफी में उपलब्ध नहीं होती। हालांकि, क्वांटम तकनीक के अलावा ऐसे एल्गोरिदम भी विकसित किए जा रहे हैं, जो भविष्य में आने वाले क्वांटम कंप्यूटरों के संभावित खतरे से डाटा की सुरक्षा कर सकें। ये एल्गोरिदम गणितीय जटिलता पर आधारित होते हैं और डेटा की गोपनीयता, उसमें बदलाव से सुरक्षा और संदेश भेजने वाले की पहचान सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।
यह भी पढ़ें: हिंद महासागर से साइबर सुरक्षा तक: भारत-आसियान मिलकर करेंगे रक्षा की नई तैयारी, रक्षा मंत्री ने रखा रोडमैप
इस तकनीक को किसने विकसित किया?
डीआरडीओ के माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, कंप्यूटेशनल सिस्टम और साइबर सुरक्षा समूह के तहत क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक को विकसित किया गया है। इसके उत्पादन में टैकबिट लैब्स साझेदार है। क्वांटम संचार का इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र के अलावा वित्त और दूरसंचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारियों और संवेदनशील संचार को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
बिना ऑप्टिकल फाइबर के कैसे होगा सुरक्षित संचार?
क्वांटम संचार की एक तकनीक फ्री-स्पेस क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन है। इसकी मदद से ऑप्टिकल फाइबर बिछाए बिना सुरक्षित संचार किया जा सकता है। इससे उन इलाकों में फायदा हो सकता है, जहां फाइबर बिछाना महंगा या मुश्किल होता है। खासकर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।
इसे बढ़ाने के लिए क्या कर रहा है डीआरडीओ?
डीआरडीओ आधुनिक रक्षा तकनीकों को विकसित करने के लिए उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसके लिए डीआरडीओ-इंडस्ट्री-एकेडेमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (डीआईए-सीओई) पहल शुरू की गई है। इसके तहत आईआईटी, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) और विश्वविद्यालयों जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में 15 केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में आधुनिक रक्षा तकनीकों को विकसित करने पर काम किया जा रहा है।
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इस तकनीक से रक्षा क्षेत्र को क्या फायदा होगा?
डीआरडीओ के मुताबिक, इस तकनीक का इस्तेमाल तोपों और बख्तरबंद हथियारों के परीक्षण के दौरान मिलने वाली अहम जानकारियों को सुरक्षित रखने में किया जा सकेगा। इन परीक्षणों के समय मिलने वाले आंकड़ों और टेलीमेट्री से जुड़ी जानकारी को सुरक्षित रखना जरूरी होता है। क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) तकनीक ऐसे आंकड़ों को सुरक्षित रखने में मदद करेगी। इससे रक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा मजबूत हो सकेगी।
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क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक क्या है?
क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन एक ऐसी तकनीक है, जिसका इस्तेमाल सुरक्षित संचार के लिए डिजिटल कुंजियां बनाने और साझा करने में किया जाता है। यह क्वांटम भौतिकी के खास गुणों पर काम करती है। इसकी मदद से संचार के दौरान किसी बाहरी व्यक्ति की ओर से जानकारी हासिल करने या जासूसी करने की कोशिश का पता लगाया जा सकता है। डीआरडीओ के मुताबिक, यह तकनीक संचार को सुरक्षित बनाने के साथ किसी की दखलंदाजी का पता लगाने में भी मदद करती है।
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दूसरी तकनीकों से कैसे अलग है क्वांटम क्रिप्टोग्राफी?
क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में भौतिकी के सिद्धांतों और खास तकनीक का इस्तेमाल करके एक लिंक के जरिए जानकारी भेजी जाती है। वैज्ञानिक सिद्धांतों के मुताबिक, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक संचार के दौरान किसी बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी का पता लगा सकती है। यह सुविधा सामान्य क्रिप्टोग्राफी में उपलब्ध नहीं होती। हालांकि, क्वांटम तकनीक के अलावा ऐसे एल्गोरिदम भी विकसित किए जा रहे हैं, जो भविष्य में आने वाले क्वांटम कंप्यूटरों के संभावित खतरे से डाटा की सुरक्षा कर सकें। ये एल्गोरिदम गणितीय जटिलता पर आधारित होते हैं और डेटा की गोपनीयता, उसमें बदलाव से सुरक्षा और संदेश भेजने वाले की पहचान सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।
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इस तकनीक को किसने विकसित किया?
डीआरडीओ के माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, कंप्यूटेशनल सिस्टम और साइबर सुरक्षा समूह के तहत क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक को विकसित किया गया है। इसके उत्पादन में टैकबिट लैब्स साझेदार है। क्वांटम संचार का इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र के अलावा वित्त और दूरसंचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारियों और संवेदनशील संचार को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
बिना ऑप्टिकल फाइबर के कैसे होगा सुरक्षित संचार?
क्वांटम संचार की एक तकनीक फ्री-स्पेस क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन है। इसकी मदद से ऑप्टिकल फाइबर बिछाए बिना सुरक्षित संचार किया जा सकता है। इससे उन इलाकों में फायदा हो सकता है, जहां फाइबर बिछाना महंगा या मुश्किल होता है। खासकर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।
इसे बढ़ाने के लिए क्या कर रहा है डीआरडीओ?
डीआरडीओ आधुनिक रक्षा तकनीकों को विकसित करने के लिए उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसके लिए डीआरडीओ-इंडस्ट्री-एकेडेमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (डीआईए-सीओई) पहल शुरू की गई है। इसके तहत आईआईटी, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) और विश्वविद्यालयों जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में 15 केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में आधुनिक रक्षा तकनीकों को विकसित करने पर काम किया जा रहा है।