नेपाल का चीन के साथ सीमित व्यापार भी अब बुरी तरह लड़खड़ा गया है, जिसका सीधा लाभ भारत को मिलता दिख रहा है। 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने नेपाल-चीन व्यापार की जीवन-रेखा रसुवागढ़ी-केरुंग सीमा को पूरी तरह उड़ा दिया। यहां तक कि सीमा-शुल्क भवनों के निशान तक नहीं बचे। इसी बीच चीन ने भूस्खलन की आशंका का हवाला देकर दूसरा प्रमुख रास्ता तातोपानी भी अस्थायी रूप से बंद है।
इन दोनों मार्गों के बंद होने से सारा दबाव कोराला (मुस्तांग) सीमा-बिंदु पर आ गया, जो पहले सबसे कम व्यस्त रास्ता था। कस्टम प्रमुख बिदुर चुडाल ने कहा, अचानक इतना बोझ आया कि कोराला की बुनियादी सुविधाएं, जनशक्ति और सड़क-नेटवर्क इसे संभालने के लिए तैयार ही नहीं थे। नेपाल न्यूज के मुताबिक इस संकट का असर अब भैरहवा पर स्पष्ट दिख रहा है। यहां कार्गो वाहनों की बढ़ती कतार नेपाली व्यापार मार्गों में बड़ी गड़बड़ी के संकेत दे रही है। यानी नेपाल में जो सामान सामान्यत: चीन से आता रहा है उसे अब भारत से मंगाया जा रहा है।
जब सामान्य हालात में उत्तरी सीमा-बिंदुओं से चीन का माल 2-3 हफ्ते में काठमांडो पहुंच जाता था, कोराला के रास्ते अब इसमें 10-12 दिन अतिरिक्त लग रहे हैं। साथ ही एक कार्गो वाहन की ढुलाई लागत अब 4.5-5 लाख नेपाली रुपये तक पहुंच गई है। अब खुद कोराला की सड़क भी बारिश-बर्फबारी से जूझ रही है। द डिप्लोमैट के विश्लेषण के मुताबिक भारत पहले से ही चीन के मुकाबले नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। ऐसे में मौजूदा हालात चीन को और पीछे धकेल सकते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, अब नेपाल को चीन से आने वाला जरूरी सामान भी भारतीय बंदरगाहों के रास्ते मंगवाना पड़ सकता है।
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अपने मकसद में चीन नाकाम
काठमांडो पोस्ट के मुताबिक, चीन ने खुद कोराला को अंतरराष्ट्रीय व्यापार-बिंदु बनाने का प्रस्ताव रखा है, जबकि नेपाल तातोपानी को फिर खोलने पर जोर दे रहा है क्योंकि वह चीन से सड़क-मार्ग का ऐतिहासिक पहला सीमा-द्वार है। कोराला, 2016 के नेपाल-चीन पारगमन प्रोटोकॉल के तहत चिह्नित छह कस्टम-बिंदुओं में से एक है, जिसका मकसद नेपाली व्यापार पर भारत की निर्भरता घटाना था, पर अभी हालात इसके उलट जा रहे हैं।
इसी बीच एक दिलचस्प घटनाक्रम में चीन के राजदूत झांग माओमिंग शनिवार को सात सदस्यीय टीम के साथ कोराला होकर लोमांथांग पहुंचे और सीमा पर अस्थायी आव्रजन-सुविधाओं का निरीक्षण किया। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक यह किसी चीनी राजदूत की कोराला सीमा से होकर पहली यात्रा है, जो इसे एक सामान्य निरीक्षण से कहीं ज्यादा अहम बना देती है।