फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारत ने क्यों बनाई ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' से दूरी?

Thu, 22 Jan 2026 09:50 PM IST
आदर्श अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम

दुनियाभर में जारी युद्ध और संघर्षों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नया कूटनीतिक दांव खेलते हुए स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के मंच की नींव रखी है। ट्रंप का दावा है कि यह नया अंतरराष्ट्रीय मंच गाजा में स्थायी शांति लाने के साथ-साथ दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी समाधान की दिशा में अहम भूमिका निभाएगा। हालांकि इस पहल को लेकर वैश्विक मंच पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई देशों ने जहां इस बोर्ड का समर्थन किया है, वहीं कई बड़े और प्रभावशाली देशों ने इससे दूरी बनाकर रखी है या अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।

सबसे पहले समझते हैं कि आखिर यह ‘बोर्ड ऑफ पीस’ है क्या। ट्रंप प्रशासन के मुताबिक, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक नया अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका उद्देश्य युद्ध और संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करना, कानून के तहत स्थिर शासन व्यवस्था को बढ़ावा देना और लंबे समय तक टिकने वाली शांति सुनिश्चित करना है। इसकी शुरुआत गाजा में इस्राइल-हमास युद्ध के बाद हुए युद्धविराम के दूसरे चरण के दौरान की गई है। ट्रंप का कहना है कि यह बोर्ड सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के दूसरे संघर्षों को खत्म करने में भी मदद करेगा।

हालांकि इस मंच के गठन के साथ ही भारत की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, लेकिन भारत दावोस में इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बना। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार ने अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है और इस पहल को बेहद संवेदनशील मानते हुए सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

भारत की सतर्कता के पीछे एक बड़ा कारण उसकी लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति मानी जा रही है। भारत लगातार इस्राइल-फलस्तीन विवाद में दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। भारत की नीति यह रही है कि इस्राइल और फलस्तीन दोनों अपने-अपने मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति और सुरक्षा के साथ रहें। ऐसे में ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का ढांचा और उसकी भूमिका भारत के लिए कूटनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।

इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ा सवाल उठ रहा है क्या ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करेगा? कई देशों और कूटनीतिक विशेषज्ञों को आशंका है कि यह नया मंच कहीं United Nations (यूएन) के प्रभाव को चुनौती देने वाला समानांतर ढांचा न बन जाए। हालांकि ट्रंप ने यह जरूर कहा है कि यह बोर्ड यूएन के साथ मिलकर भी काम कर सकता है, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि दोनों संस्थाओं के बीच तालमेल कैसे होगा।

यही वजह है कि अमेरिका के कई सहयोगी देश भी इस पहल को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं। दावोस में चार्टर पर दस्तखत करते हुए ट्रंप ने कहा कि यह बोर्ड दुनिया के लिए “कुछ बहुत ही अनोखा” है और यह केवल मध्य-पूर्व ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे युद्धों और संघर्षों को खत्म करने में भी मदद कर सकता है।

अगर समर्थन करने वाले देशों की बात करें तो ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाखस्तान, मोरक्को, पाकिस्तान, यूएई, सऊदी अरब और वियतनाम जैसे देश शामिल हो चुके हैं। इन देशों ने इस पहल को समर्थन देते हुए इसे शांति की दिशा में एक नया प्रयोग बताया है।

वहीं दूसरी ओर कई बड़े और प्रभावशाली देश अभी भी इस पहल से दूर हैं या अनिश्चितता की स्थिति में हैं। इन देशों में भारत, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, इटली, रूस, तुर्किये, यूक्रेन, स्लोवेनिया और पराग्वे शामिल हैं। इससे साफ है कि ट्रंप का यह नया मंच वैश्विक राजनीति में एक नए ध्रुवीकरण की शुरुआत भी कर सकता है।

कुल मिलाकर, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर जहां ट्रंप इसे शांति का नया वैश्विक मॉडल बता रहे हैं, वहीं कई देश इसे संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को चुनौती देने वाले मंच के तौर पर भी देख रहे हैं। भारत समेत कई बड़े देश फिलहाल सोच-समझकर कदम बढ़ाने की रणनीति अपना रहे हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह बोर्ड वाकई शांति का जरिया बनेगा या फिर वैश्विक कूटनीति में एक और विवादित मंच बनकर रह जाएगा।

विज्ञापन

Latest

Recommended

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
AU ऐप में पढ़ें