पंजाब की राजनीति में पंथक मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। लंबे समय तक सिख राजनीति की सबसे प्रभावशाली ताकत रहे शिरोमणि अकाली दल (बादल) के सामने अब चुनौती केवल आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा से नहीं बल्कि उभर रहे अकाली दल वारिस पंजाब दे से भी है। हाल के घटनाक्रम संकेत दे रहे हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंथक राजनीति का केंद्र तेजी से बदल रहा है। पंथक राजनीति हमेशा सिख धार्मिक पहचान, बंदी सिखों की रिहाई, बेअदबी के मामलों, श्री अकाल तख्त साहिब और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रही है। लंबे समय तक शिअद बादल इसका सबसे बड़ा प्रतिनिधि रहा लेकिन पिछले एक दशक में उसकी पंथक विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठे हैं। बेअदबी की घटनाओं, शासनकाल के विवादित फैसलों और सुखबीर सिंह बादल को श्री अकाल तख्त की ओर से तनखैया घोषित किए जाने के घटनाक्रम ने पार्टी की साख को प्रभावित किया। इसी माहौल में सांसद अमृतपाल सिंह के नेतृत्व से जुड़ा अकाली दल वारिस पंजाब दे संगठन का तेजी से विस्तार कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों और सिख युवाओं में इसकी सक्रियता बढ़ी है। बंदी सिखों की रिहाई और धार्मिक मुद्दों पर आक्रामक रुख ने इसे नई पहचान दिलाई है। हाल ही में चंडीगढ़ में अमृतपाल सिंह समेत अन्य बंदी सिखों की रिहाई की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन ने पंथक राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया। मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव हुआ तथा पानी की बौछारें चलानी पड़ीं। वहीं प्रस्तावित बेअदबी विरोधी कानून को लेकर पंजाब सरकार और श्री अकाल तख्त साहिब के बीच मतभेद भी खुलकर सामने आए। अकाल तख्त ने मसौदा तैयार करने से पहले प्रमुख सिख संस्थाओं को विश्वास में नहीं लेने पर आपत्ति जताई। राजनीतिक हलकों में मनप्रीत सिंह इयाली, इकबाल सिंह झुंदा और संता सिंह उमेदपुरी जैसे नेताओं के नए पंथक विकल्पों की ओर बढ़ने की चर्चा भी है।