फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

MP News : अनाथ शावकों की एमपी में अनोखी पाठशाला, ऐसे बनाया जाता है 'जंगली'; 20 बाघों को मिला नया जीवन

Tue, 28 Jul 2026 09:59 AM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

मध्य प्रदेश ने अनाथ बाघ शावकों को बचाने के साथ उन्हें दोबारा जंगल में बसाने का मॉडल विकसित किया है। कान्हा के घोरेला से शुरू इस प्रयोग के तहत 20 से ज्यादा शावकों को प्रशिक्षण के बाद जंगल में छोड़ा जा चुका है, जबकि पन्ना और नौरादेही में भी रिवाइल्डिंग से बाघों की आबादी बढ़ाने में मदद मिली है। पढ़ें पूरी खबर
विज्ञापन
1 of 8
रिवाइल्डिंग मॉडल से फिर आबाद हुए जंगल। - फोटो : अमर उजाला
मध्य प्रदेश ने अनाथ और मां से बिछड़े बाघ शावकों को बचाने के साथ उन्हें दोबारा जंगल में बसाने का एक खास रिवाइल्डिंग 'जंगल में पुन: बसाने' मॉडल विकसित किया है। इस प्रक्रिया में शावकों को केवल सुरक्षित रखने के बजाय प्राकृतिक परिस्थितियों में उन्हें इस तरह तैयार किया जाता है कि वे बड़े होने के बाद बिना इंसानी मदद के शिकार कर सकें और जंगल में स्वतंत्र जीवन जी सकें। प्रदेश में अब तक 20 से ज्यादा बाघ शावकों को प्रशिक्षण देने के बाद प्राकृतिक आवास में छोड़ा जा चुका है।


 
विज्ञापन

2 of 8
पन्ना में बाघों की संख्या करीब 100 के करीब पहुंच गई। - फोटो : अमर उजाला
पन्ना में बाघों की संख्या करीब 100 और नौरादेही में 25 से ज्यादा हो गई
प्रदेश के वन बल प्रमुख शुभरंजन सेन के मुताबिक, रिवाइल्डिंग के इस प्रयोग की सफलता यह है कि जिन इलाकों में एक समय बाघों की संख्या लगभग खत्म हो गई थी, वहां दोबारा बाघों की आबादी स्थापित करने में मदद मिली। पन्ना में बाघों की संख्या करीब 100 और नौरादेही में 25 से ज्यादा हो गई है।

पन्ना और नौरादेही ऐसे क्षेत्र रहे हैं, जहां एक समय बाघों की संख्या लगभग शून्य के करीब पहुंच गई थी। यहां अनाथ बाघिनों और शावकों के जोड़ों को उपयुक्त परिस्थितियों में छोड़ा गया। इसके बाद इन क्षेत्रों में बाघों की संख्या बढ़ाने में सफलता मिली। इस मॉडल का मकसद केवल बाघों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर छोड़ना नहीं है। असली लक्ष्य ऐसे बाघ तैयार करना है, जो नए जंगल में खुद शिकार कर सकें, इंसानों से दूरी बनाए रखें और अपना क्षेत्र बना सकें।

ये भी पढ़ें-  MP: एमपी को मूंग खरीद का 87% कोटा, अब तक सिर्फ 2% खरीदी; केंद्र बोला- पहले मंजूर मात्रा पूरी करें
विज्ञापन

3 of 8
बाघ शावकों के पुनर्वास के लिए घोरेला क्षेत्र में वर्ष 2006 में विशेष बाड़ा बनाया गया था। - फोटो : अमर उजाला
कान्हा के घोरेला से शुरू हुआ प्रयोग
मंडला के कान्हा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर प्रकाश कुमार वर्मा के मुताबिक, अनाथ बाघ शावकों के पुनर्वास के लिए घोरेला क्षेत्र में वर्ष 2006 में विशेष बाड़ा बनाया गया था। यहां शावकों को जंगल जैसा माहौल दिया जाता है। पानी, प्राकृतिक वनस्पति, छिपने की जगह और चीतल जैसे शिकार की व्यवस्था है। घोरेला का अंदरूनी बाड़ा करीब 7 हेक्टेयर में फैला है। इसमें छोटा तालाब, करीब 300 मीटर लंबा नाला, खुले मैदान और साल, आम, महुआ, लेंडिया व तेंदू के पेड़-पौधे हैं। करीब 3.7 मीटर ऊंची फेंसिंग के साथ बाड़े को इस तरह तैयार किया गया है कि शावकों को बाहर की मानवीय गतिविधियां कम से कम दिखाई दें। चार वाच टावरों से बाघों की 24 घंटे निगरानी की जाती है। इससे वनकर्मियों को बार-बार उनके पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती और इंसानों से दूरी बनी रहती है। 

ये भी पढ़ें-  दतिया का दंगल: आशुतोष साध रहे जातीय समीकरण तो घनश्याम को जनता से सीधा जुड़ाव पहुंचा रहा लाभ

4 of 8
अपने दम पर शिकार करना रिवाइल्डिंग की सबसे अहम कसौटी है। - फोटो : अमर उजाला
पहले भोजन, फिर शिकार और आखिर में जंगल
रिवाइल्डिंग की प्रक्रिया में शावक के रेस्क्यू के बाद उसकी स्वास्थ्य स्थिति और उम्र का आकलन किया जाता है। शुरुआत में देखभाल और भोजन दिया जाता है, लेकिन इंसानों से संपर्क न्यूनतम रखा जाता है। इसके बाद प्राकृतिक बाड़े में शावक को छोटे शिकार का अभ्यास कराया जाता है। धीरे-धीरे उसे बड़े शिकार की ओर बढ़ाया जाता है। जब शावक खुद शिकार करने में सक्षम हो जाता है तो उसे चीतल जैसे प्राकृतिक शिकार के साथ बड़े बाड़े में रखा जाता है। अपने दम पर शिकार करना रिवाइल्डिंग की सबसे अहम कसौटी है। 

ये भी पढ़ें-  Bhopal News: 67 साल के बुजुर्ग से 3.91 करोड़ की साइबर ठगी, शेयर बाजार में भारी मुनाफे का दिया था झांसा
विज्ञापन

5 of 8
20 से ज्यादा बाघ शावकों को प्रशिक्षण देकर जंगल में छोड़ा जा चुका है। - फोटो : अमर उजाला
20 से ज्यादा शावक लौटे जंगल
शुभरंजन सेन के अनुसार, घोरेला और इस तरह की रिवाइल्डिंग प्रक्रिया से 20 से ज्यादा बाघ शावकों को प्रशिक्षण देकर जंगल में छोड़ा जा चुका है। घोरेला में वर्तमान में करीब 30 माह के दो नर और 19-20 माह की दो मादा बाघों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। घोरेला बाड़े के बनने के बाद पांच नर और तीन मादा बाघों को प्रशिक्षण देकर प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया, जबकि दो नर और एक मादा को दूसरे टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किया गया। 

ये भी पढ़ें-  Bhopal News: कपड़ों और फर्श के तहखानों में छिपा रखा था गांजा, 300 जवानों ने पुराने भोपाल में आधी रात मारे छापे
विज्ञापन

6 of 8
यहां भी प्रशिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। - फोटो : अमर उजाला
अब बांधवगढ़ और सतपुड़ा में भी ट्रेनिंग
वन बल प्रमुख के मुताबिक, इस मॉडल की सफलता के बाद बांधवगढ़ और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में भी प्रशिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। कोशिश है कि ऐसे बाघों की संख्या कम हो जिन्हें प्रशिक्षण के बाद भी जंगल में छोड़ना संभव नहीं हो पाता। हर रेस्क्यू किए गए बाघ को जंगल में छोड़ना संभव नहीं होता। स्वास्थ्य, उम्र, प्राकृतिक व्यवहार, शिकार क्षमता और इंसानों से दूरी जैसे पहलुओं के आधार पर निर्णय लिया जाता है।  

ये भी पढ़ें-  MP News: ‘मन की बात’ में छाया MP का जल संरक्षण मॉडल, PM मोदी ने सीधी-नरसिंहपुर को सराहा
विज्ञापन

7 of 8
रिवाइल्डिंग के बाद भी बाघ की निगरानी जारी रहती है। - फोटो : अमर उजाला
जंगल में छोड़ने के बाद भी निगरानी
रिवाइल्डिंग के बाद भी बाघ की निगरानी जारी रहती है। जरूरत के अनुसार रेडियो या सैटेलाइट कॉलर से उसकी लोकेशन और मूवमेंट पर नजर रखी जाती है। यह देखा जाता है कि वह शिकार कर पा रहा है या नहीं, अपना क्षेत्र बना रहा है या नहीं और इंसानी बस्तियों की ओर तो नहीं जा रहा। याद रहे, 2022 की गणना के अनुसार मध्य प्रदेश में बाघों की कुल संख्या 785 है और प्रदेश को टाइगर स्टेट यानी देश में सर्वाधिक बाघ वाले राज्य का दर्जा प्राप्त है।  

ये भी पढ़ें-  Bhopal E-Bus: भोपाल में कल से शुरू होगा ई-बसों का ट्रायल, 15 अगस्त तक यात्रियों को मुफ्त सफर
विज्ञापन

8 of 8
प्रशिक्षण के दौरान इंसानों से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी। - फोटो : अमर उजाला
इंसानों से दूरी बनाए रखना जरूरी : दुबे
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने कहा कि एनक्लोजर में प्रशिक्षण के दौरान इंसानों से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी है। सावधानी नहीं बरती गई तो शावक मनुष्यों पर निर्भर हो सकता है और उसे जंगल में छोड़ना जोखिम भरा हो सकता है। उन्होंने बताया कि सतपुड़ा में एक रेस्क्यू किए गए बाघ को जंगल में छोड़ने के बाद वह बार-बार गांव की ओर जाने लगा था।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें