सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी अश्लील सामग्री को रोकने में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की नाकामी पर सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने निर्देश दिया है कि ऐसी सामग्री को पेवॉल या पेड सब्सक्रिप्शन के जरिए भी उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने की व्यवस्था पर विचार करने और प्रतिबंधित सामग्री से होने वाली कमाई जब्त करने को लेकर भी निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
शीर्ष अदालत ने कहा कि 2024 में निर्देश दिए जाने के बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने उनका ठीक से पालन नहीं किया। 15 अक्तूबर को दिए गए आदेश में पीठ ने कहा कि दो साल से अधिक समय बीतने के बाद भी इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है। शीर्ष अदालत ने बच्चों की सुरक्षा और उनके कल्याण को लेकर सामने आई हालिया खबरों पर भी गहरी चिंता जताई।
- शीर्ष अदालत के फैसले के मुताबिक, किसी भी इंटरनेट मध्यस्थ को बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री या बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली दूसरी सामग्री को पेड सब्सक्रिप्शन के जरिए उपलब्ध कराने, अपलोड करने, प्रचारित करने या साझा करने की अनुमति नहीं होगी।
- प्रतिबंधित सामग्री से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कमाई करने वाले प्लेटफॉर्म की उस सामग्री से हुई कमाई जब्त कर वापस लेने की व्यवस्था करने को कहा गया है।
कंपनियों पर जुर्माना लगाने की तैयारी?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उसके नियमों के तहत प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों का उल्लंघन करने पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा है। जुर्माने की रकम तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बार-बार नियम तोड़ने और कंपनी के आकार व कारोबार को ध्यान में रखने की बात कही गई है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम के जरिए हानिकारक सामग्री के अप्रत्यक्ष लिंक साझा किए जा रहे हैं। इससे बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनी प्रावधानों से बचने का रास्ता मिलता है। केंद्र को सभी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंधित सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए परसेप्चुअल हैश मैचिंग और यूआरएल सूची के इस्तेमाल से जुड़े दिशा-निर्देश या मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने को कहा गया है।
कैसे लग सकती है इस पर रोक?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय हैश और यूआरएल सूची डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है। यदि किसी प्लेटफॉर्म को अज्ञात स्रोत से ऐसी सामग्री मिलती है, तो उसे हटाने से पहले उचित सत्यापन और जांच करनी होगी। इसके बाद संबंधित अधिकारियों और निर्धारित डेटाबेस निकाय को इसकी सूचना देनी होगी। अदालत के मुताबिक, प्रतिबंधित सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए तकनीकी व्यवस्था के साथ-साथ प्लेटफॉर्म और संबंधित अधिकारियों को भी गंभीरता से काम करना होगा।
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क्या बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना समाधान है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मौलिक अधिकार है। बच्चों को भी ये अधिकार प्राप्त हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि बच्चों को पूरी तरह इंटरनेट से दूर रखने के बजाय उनकी सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए। केवल सोशल मीडिया से दूर रखने पर बच्चे दूसरी, अनियमित और अधिक असुरक्षित वेबसाइटों की ओर जा सकते हैं।
शीर्ष अदालत ने संसद से पॉक्सो कानून में 'बच्चों के अश्लील सामग्री' शब्द की जगह 'चाइल्ड एक्सप्लॉइटेटिव एंड एब्यूज मटीरियल' इस्तेमाल करने पर विचार करने को कहा था। अदालत ने यह भी कहा था कि बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री देखना और डाउनलोड करना पॉक्सो कानून तथा सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत अपराध है।