राखीगढ़ी में इस सत्र की खोदाई छठ पर्व के बाद शुरू होगी। खोदाई के दौरान टीलों की सीमाएं तय करने का प्रयास किया जाएगा। पुरातात्विक सीमाएं तय होने के बाद जल संसाधनों की पहचान की जाएगी। टीलों की खोदाई में मिली धरोहरों का मिलान किया जाएगा ताकि इनके बीच अंतर या समानता पता चल सके।
हड़प्पा सभ्यता का सूखे से पतन नहीं हुआ...यहां चावल-गेहूं की खेती थी
हड़प्पा सभ्यता के पतन के पीछे सूखे को एक प्रमुख कारण माना जाता रहा है। पुरातात्विक विशेषज्ञ नीरज राय ने इस पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राखीगढ़ी में खोदाई के दौरान क्षेत्र में भीषण सूखे के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं। यहां तालाब और नदी जैसे जल संसाधन उपलब्ध थे और गेहूं-चावल की खेती होती थी। ये साक्ष्य इस क्षेत्र में कृषि और आबादी के भरण-पोषण के लिए संसाधनों की उपलब्धता की ओर संकेत करते हैं। ऐसे में सूखे को ही लोगों के पलायन का कारण मानने के लिए और प्रमाणों की जरूरत है। उस दौर में प्लेग जैसी किसी बड़ी महामारी के प्रमाण भी अब तक नहीं मिले हैं।
राखीगढ़ी में गामड़ा और राखी शाहपुर को टीला नंबर 8 व 9 के तौर पर चिह्नित किया है। इनकी अधिसूचना जारी कराने के लिए केंद्र व प्रदेश सरकार से अनुरोध किया है। अधिसूचित होने के बाद इस क्षेत्र को संरक्षित किया जा सकेगा। -डॉ. मनोज सक्सेना, अधीक्षण पुरातत्वविद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग।
राखीगढ़ी एक विकसित आवासीय और प्रशासनिक केंद्र था लेकिन इसे प्रमुख व्यापारिक केंद्र मानने के स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। इसके विपरीत गुजरात स्थित लोथल आकार में अपेक्षाकृत छोटा केंद्र था लेकिन वहां लोगों की आवाजाही और व्यापारिक गतिविधियों के संकेत मिलते हैं। राखीगढ़ी के साक्ष्य बताते हैं कि यह एक प्रमुख बस्ती थी जहां लोगों ने स्थायी रूप से रहना चुना था। -नीरज राय, वैज्ञानिक, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ।