हालांकि, समग्र वैश्विक सूचकांक में शामिल 1,000 शहरों की रैंकिंग में भारतीय शहर अभी शीर्ष स्तर पर नहीं हैं, लेकिन भारत के लिए उत्साहजनक बात यह है कि उभरते हुए शहरों की सूची में उसके 55 शहरों को जगह मिली है और शीर्ष-50 में भी 23 भारतीय शहर शामिल हैं।
ऑक्सफोर्ड इकनॉमिक्स का आकलन भारतीय शहरों की मजबूत जीडीपी वृद्धि, बढ़ते श्रमबल, उत्पादकता और आय में संभावित बढ़ोतरी को उनकी भावी आर्थिक ताकत का आधार मानता है। लंबे समय तक भारत की आर्थिक कहानी में मुंबई, दिल्ली, बंगलूरू, चेन्नई और हैदराबाद जैसे महानगरों का दबदबा रहा है। लेकिन, अब आगरा, जयपुर, अमरावती, सूरत और तिरुचिरापल्ली जैसे अनेक शहर अपने-अपने क्षेत्रीय आर्थिक तंत्र विकसित कर रहे हैं।
डिजिटल बुनियादी ढांचे, बेहतर कनेक्टिविटी, औद्योगिक गलियारों, स्टार्टअप संस्कृति और सरकारी निवेश ने महानगरों के बाहर भी आर्थिक गतिविधियों के लिए जमीन तैयार की है। यह बदलाव देश के लिए इसलिए अहम है कि इससे आर्थिक अवसरों का भौगोलिक विस्तार होगा और महानगरों पर आबादी तथा संसाधनों का दबाव भी कम किया जा सकेगा। दिल्ली का उदाहरण इस संभावना तथा चुनौती, दोनों को और स्पष्ट करता है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली वर्तमान में दुनिया की 63वीं सबसे बड़ी शहरी अर्थव्यवस्था है और 2050 तक इसके 14वें स्थान पर पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई है।
हालांकि, खराब वायु गुणवत्ता और आय असमानता को इसके सम्मुख सबसे बड़ी चुनौतियां बताया गया है। ऐसे में, यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या भारत अपने शहरों की तेज आर्थिक वृद्धि को रहने योग्य और टिकाऊ शहरों में बदल पा रहा है। आर्थिक विकास खुद में बेहतर जीवन गुणवत्ता की गारंटी नहीं देता। बढ़ते शहरों में यातायात, प्रदूषण, जल संकट, कचरा प्रबंधन, आवास की कमी, असमानता और सार्वजनिक परिवहन जैसी समस्याएं अगर समय रहते नहीं सुलझाई गईं, तो आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा शहरी अव्यवस्था की कीमत चुकाने में ही खर्च हो सकता है।
इसलिए, हमारे सामने अगली चुनौती अधिक शहरों को आर्थिक विकास की दौड़ में आगे लाने के साथ ऐसे शहरों के निर्माण की भी है, जहां आर्थिक अवसरों का लाभ व्यापक आबादी तक पहुंचे और विकास का पर्यावरणीय व सामाजिक बोझ असहनीय न हो। ऐसा होने पर ही 55 शहरों का यह आंकड़ा आने वाले वर्षों में कहीं व्यापक आर्थिक परिवर्तन की नींव बन सकता है।