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अंतरिक्ष: पहली बार किसी बाहरी ग्रह से आए रेडियो संकेत, वैज्ञानिकों ने सीधे पकड़ी 'दूसरी दुनिया' की आवाज
Fri, 25 Sep 2026 03:32 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Fri, 25 Sep 2026 03:32 PM IST
सार
अंतरिक्ष में 64 प्रकाशवर्ष दूर स्थित गैस दानव ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी से पहली बार रेडियो संकेत सीधे पकड़े गए हैं। वैज्ञानिकों ने मीरकैट रेडियो दूरबीन की मदद से इन संकेतों को ग्रह की स्थिति से जोड़ा। ये किसी एलियन सभ्यता का संदेश नहीं, बल्कि ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र से पैदा होने वाली प्राकृतिक ऑरोरा प्रक्रिया का परिणाम हैं। इस खोज से बाहरी ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों को समझने का नया रास्ता खुला है।
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अंतरिक्ष से आई रहस्यमयी रेडियो तरंगों का खुला राज
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अंतरिक्ष में 64 प्रकाशवर्ष दूर मौजूद एक विशाल गैस ग्रह से पहली बार रेडियो संकेत सीधे पकड़े गए हैं। वैज्ञानिकों ने इन संकेतों का स्रोत उसके मूल तारे के बजाय ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी को पाया है। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रेडियो तरंगों ने न सिर्फ इस दूरस्थ दुनिया की मौजूदगी को एक नए तरीके से दर्ज किया, बल्कि उसके शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की भी पहली प्रत्यक्ष झलक दी है। संकेत किसी एलियन सभ्यता का संदेश नहीं, बल्कि ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी प्राकृतिक ऑरोरा प्रक्रिया से पैदा हुए हैं।
फिजिक्स डॉट ऑर्ग की रिपोर्ट के अनुसार यह शोध केविन एन. ऑर्टिज सेबालोस के नेतृत्व वाली टीम ने किया है और इसके निष्कर्ष आर्काइव पर प्रकाशित शोध-पत्र में सामने आए हैं।हमारे सौर मंडल के बाहर दूसरे तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों को बाहरी ग्रह या एक्सोप्लैनेट कहा जाता है। 1990 के दशक में इन ग्रहों की खोज शुरू होने के बाद से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दूरस्थ दुनियाओं का वातावरण, आंतरिक संरचना और चुंबकीय क्षेत्र कैसा होता है।इससे पहले भी बाहरी ग्रह प्रणालियों से रेडियो संकेत दर्ज किए जा चुके हैं, लेकिन वैज्ञानिक यह निश्चित नहीं कर सके थे कि ये संकेत ग्रह से आ रहे हैं या उसके मूल तारे से। बीटा पिक्टोरिस बी के मामले में पहली बार संकेत के स्रोत को सीधे ग्रह की स्थिति से जोड़ने में सफलता मिली है।
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इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि ऐसे ग्रहों के भीतर चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनते हैं और उनके निर्माण तथा विकास में उनकी क्या भूमिका होती है।
फिर भी वैज्ञानिक दृष्टि से यह खोज महत्वपूर्ण है। पहली बार किसी बाहरी ग्रह से आने वाले रेडियो उत्सर्जन को उसके तारे से अलग करके सीधे ग्रह से जोड़ा गया है। साथ ही, इसी प्रक्रिया ने वैज्ञानिकों को उस ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को मापने का अवसर दिया है।यानी 64 प्रकाशवर्ष दूर स्थित यह गैस दानव ग्रह इंसानों को कोई संदेश नहीं भेज रहा, लेकिन उसकी ‘रेडियो आवाज’ ने वैज्ञानिकों को उसकी अदृश्य चुंबकीय दुनिया की पहली सीधी झलक जरूर दे दी है।
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फिजिक्स डॉट ऑर्ग की रिपोर्ट के अनुसार यह शोध केविन एन. ऑर्टिज सेबालोस के नेतृत्व वाली टीम ने किया है और इसके निष्कर्ष आर्काइव पर प्रकाशित शोध-पत्र में सामने आए हैं।हमारे सौर मंडल के बाहर दूसरे तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों को बाहरी ग्रह या एक्सोप्लैनेट कहा जाता है। 1990 के दशक में इन ग्रहों की खोज शुरू होने के बाद से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दूरस्थ दुनियाओं का वातावरण, आंतरिक संरचना और चुंबकीय क्षेत्र कैसा होता है।इससे पहले भी बाहरी ग्रह प्रणालियों से रेडियो संकेत दर्ज किए जा चुके हैं, लेकिन वैज्ञानिक यह निश्चित नहीं कर सके थे कि ये संकेत ग्रह से आ रहे हैं या उसके मूल तारे से। बीटा पिक्टोरिस बी के मामले में पहली बार संकेत के स्रोत को सीधे ग्रह की स्थिति से जोड़ने में सफलता मिली है।
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मीरकैट ने पकड़े कमजोर लेकिन दोहराए जाने वाले संकेत
वैज्ञानिकों ने दक्षिण अफ्रीका की मीरकैट रेडियो दूरबीन से बीटा पिक्टोरिस ग्रह प्रणाली का अध्ययन किया। इस दौरान उन्हें बेहद कमजोर लेकिन बार-बार दोहराए जाने वाले रेडियो संकेत मिले।शुरुआत में यह स्पष्ट नहीं था कि संकेत ग्रह से आ रहे हैं या उसके तारे से। इसकी पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं ने रेडियो तस्वीरों में दिखाई देने वाले स्रोतों की स्थिति को बेहद दूर स्थित क्वासरों के सापेक्ष निर्धारित किया। क्वासर इस तरह के खगोलीय माप में स्थिर संदर्भ बिंदु के रूप में काम कर सकते हैं।इसके बाद वैज्ञानिकों ने तारे और ग्रह की सटीक स्थिति के साथ रेडियो संकेतों का मिलान किया। संकेत का स्थान बीटा पिक्टोरिस तारे के बजाय उसके ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी की स्थिति से मेल खाता मिला। इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने रेडियो उत्सर्जन को सीधे ग्रह से जोड़ने का निष्कर्ष निकाला।
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ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से बन रही है रेडियो आवाज
वैज्ञानिकों के अनुसार इन रेडियो संकेतों के पीछे कोई कृत्रिम संदेश नहीं है। यह एक प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रिया है, जो ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी है।जब उच्च ऊर्जा वाले आवेशित कण ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के साथ गति करते हैं और उसके ऊपरी वायुमंडल से टकराते या परस्पर क्रिया करते हैं, तो ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी प्रक्रिया से ध्रुवीय ज्योति यानी ऑरोरा पैदा होती है।पृथ्वी पर भी ऐसी प्रक्रिया होती है। उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाली उत्तरी रोशनी इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। बीटा पिक्टोरिस बी के मामले में इसी तरह की ऑरोरल गतिविधि से रेडियो तरंगें पैदा होने के प्रमाण मिले हैं।बृहस्पति से भी अधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र
इस खोज का सबसे अहम पहलू ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि जिस क्षेत्र से रेडियो तरंगें पैदा हो रही हैं, वहां बीटा पिक्टोरिस बी के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत कम से कम 1,250 गॉस है।यह बृहस्पति के चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में काफी अधिक है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह किसी बाहरी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का पहला प्रत्यक्ष मापन है।इससे पहले बाहरी ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों के बारे में वैज्ञानिकों को मुख्य रूप से सैद्धांतिक मॉडल और अप्रत्यक्ष संकेतों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब रेडियो उत्सर्जन के जरिए इन क्षेत्रों का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का रास्ता खुल सकता है।युवा और विशाल ग्रह के अध्ययन से क्या पता चलेगा
बीटा पिक्टोरिस बी एक विशाल गैस दानव ग्रह है और अपेक्षाकृत युवा ग्रह प्रणाली का हिस्सा है। युवा और विशाल ग्रहों के भीतर निर्माण के समय बची ऊर्जा और तीव्र आंतरिक गतिविधियां शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र पैदा कर सकती हैं।शोधकर्ताओं के अनुसार इस ग्रह से मिले रेडियो संकेतों के आधार पर चुंबकीय क्षेत्र की जो ताकत सामने आई है, वह युवा और विशाल ग्रहों में चुंबकीय क्षेत्र की ताकत को लेकर की गई सैद्धांतिक भविष्यवाणियों के अनुरूप है।इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि ऐसे ग्रहों के भीतर चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनते हैं और उनके निर्माण तथा विकास में उनकी क्या भूमिका होती है।
बाहरी ग्रहों को देखने का नया तरीका
बाहरी ग्रहों की खोज और अध्ययन के लिए अब तक वैज्ञानिक मुख्य रूप से उनके तारों की रोशनी में होने वाले बदलाव, ग्रह की कक्षीय गति और ग्रहों के वातावरण से जुड़े संकेतों का इस्तेमाल करते रहे हैं। रेडियो खगोल विज्ञान इसमें एक नया आयाम जोड़ सकता है।अगर दूसरे विशाल बाहरी ग्रहों से भी इसी तरह के रेडियो संकेत दर्ज किए जा सके, तो वैज्ञानिक अलग-अलग ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों की तुलना कर सकेंगे। इससे ग्रहों की आंतरिक संरचना, निर्माण और विकास को समझने में मदद मिल सकती है।विशेष रूप से, ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र उसके आसपास के अंतरिक्षीय वातावरण से उसकी बातचीत को प्रभावित करता है। इसलिए रेडियो उत्सर्जन का अध्ययन केवल ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की जानकारी नहीं देता, बल्कि उसके आसपास के अंतरिक्षीय पर्यावरण को समझने में भी उपयोगी हो सकता है।‘एलियन संदेश’ नहीं, लेकिन बड़ी वैज्ञानिक खोज
रेडियो संकेत सुनते ही बाहरी अंतरिक्ष में जीवन या एलियन सभ्यता की संभावना का सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन बीटा पिक्टोरिस बी से मिले संकेत ऐसी किसी सभ्यता या बुद्धिमान जीवन का प्रमाण नहीं हैं। ये संकेत प्राकृतिक ऑरोरल प्रक्रिया से पैदा हुए हैं।फिर भी वैज्ञानिक दृष्टि से यह खोज महत्वपूर्ण है। पहली बार किसी बाहरी ग्रह से आने वाले रेडियो उत्सर्जन को उसके तारे से अलग करके सीधे ग्रह से जोड़ा गया है। साथ ही, इसी प्रक्रिया ने वैज्ञानिकों को उस ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को मापने का अवसर दिया है।यानी 64 प्रकाशवर्ष दूर स्थित यह गैस दानव ग्रह इंसानों को कोई संदेश नहीं भेज रहा, लेकिन उसकी ‘रेडियो आवाज’ ने वैज्ञानिकों को उसकी अदृश्य चुंबकीय दुनिया की पहली सीधी झलक जरूर दे दी है।