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'अमेरिका ने जानबूझकर खुद को बनाया अकेली ताकत': म्यूनिख में जयशंकर का बड़ा बयान, चीन को लेकर कही ये बात
Sun, 04 Oct 2026 04:48 PM IST
देवेश त्रिपाठी
एएनआई, म्यूनिख
एएनआई, म्यूनिख
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Sun, 04 Oct 2026 04:48 PM IST
सार
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलावों पर चर्चा की। उन्होंने अमेरिका के बदले रुख और चीन के बढ़ते प्रभाव को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य की प्रमुख विशेषताओं के रूप में बताया। जयशंकर ने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा अब दो देशों तक सीमित नहीं है और विभिन्न देशों के पास मौजूद प्रभाव के साधनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
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एस जयशंकर, विदेश मंत्री
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
विस्तार
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार को वैश्विक भू-राजनीति के बदलते समीकरणों पर बात की। एस जयशंकर ने कहा कि अमेरिका का बदला हुआ रुख और चीन का उभार आज के अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के दो मुख्य स्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा अब केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने विभिन्न देशों के पास मौजूद प्रभाव और साधनों के इस्तेमाल को भी एक नए रूप में ला दिया है।
म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में बोलते हुए जयशंकर ने अमेरिका के "बड़े बदलाव वाले रुख" का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह उसकी अपनी पसंद का रुख है और एक तरह से अमेरिका "जानबूझकर खुद को अधिक अकेली शक्ति बना चुका है।"
अमेरिका-चीन की प्रतिस्पर्धा का दुनिया पर क्या पड़ा असर?
जयशंकर ने कहा, "आज के परिदृश्य की पहली प्रमुख विशेषता अमेरिका का अपने रुख में बड़ा बदलाव है। यह बदलाव उसकी पसंद का है और एक तरह से उसने जानबूझकर खुद को अधिक अकेली शक्ति बनाया है।" उन्होंने कहा कि दूसरी प्रमुख विशेषता चीन का उभार है। जयशंकर के अनुसार, चीन खुद को एक विशिष्ट देश के रूप में देखता है और वैश्विक स्तर पर दोनों के बीच काफी तीखी प्रतिस्पर्धा है।
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विदेश मंत्री ने कहा कि यह प्रतिस्पर्धा केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, इसने "किसी भी देश के पास मौजूद किसी भी प्रभाव या साधन के इस्तेमाल को एक हथियार के रूप में बदल दिया है।" उन्होंने कहा कि यह प्रतिस्पर्धा आपसी निर्भरता की जटिलता के साथ-साथ चल रही है।
उभरती और मध्यम शक्तियों के सहयोग पर जोर
जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियों के बीच जहां उनके हितों का सीधा टकराव नहीं है, वहां वे आपसी सहयोग को मजबूत करने में रुचि रखती हैं। उन्होंने कहा कि इन देशों का अमेरिका और चीन के साथ सहयोग करना भी स्वाभाविक है। उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर क्वाड का जिक्र किया। कनेक्टिविटी के क्षेत्र में उन्होंने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा और नॉर्दर्न सी रूट का जिक्र किया।
जयशंकर ने कहा कि ब्रिक्स भी इसका एक उदाहरण है, जहां विभिन्न पक्षों को लगता है कि उनकी सामूहिक आवाज अलग-अलग आवाजों की तुलना में अधिक प्रभावी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा रोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन का भी उल्लेख किया। जयशंकर ने कहा कि इन दोनों पहलों की शुरुआत भारत ने की और वे सफल रही हैं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में कई देश, जरूरी नहीं कि वे प्रमुख शक्तियां हों, अपने हितों के अनुसार एक साथ आ रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसे देश काम करने की व्यवस्थाएं बनाते हैं, एजेंडा तैयार करते हैं, संगठन विकसित करते हैं और सहयोग की आदतें विकसित करते हैं। उन्होंने इसे आज की बदलती वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा बताया।
यूरोपीय देशों को लेकर क्या बोले जयशंकर?
विदेश मंत्री ने कहा, "यूरोप दुनिया को बहुत कुछ दे सकता है। गहरी साझेदारी के लिहाज से इससे बड़ा लाभ हो सकता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि यूरोप खुद भी शायद इसके बारे में पर्याप्त रूप से जागरूक नहीं है।" उन्होंने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में यूरोप समग्र रूप से अधिक एकजुट हुआ है और इसलिए वैश्विक मंच पर बहुध्रुवीय व्यवस्था के एक ध्रुव के रूप में उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ी है।"
जयशंकर ने कहा, "आज यूरोप के पास वास्तव में एक बहुत मजबूत पक्ष है और सच कहूं तो भारत जैसे देश के लिए यूरोप से जुड़ने और उसके साथ अपने संबंधों को विकसित करने का यह बेहद मजबूत आकर्षण है।"
बहुध्रुवीयता के तेज उभार का भी जिक्र
जयशंकर ने वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवीयता के तेजी से उभरने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देशों के लिए ऐसे कई पक्षों के साथ संबंध रखना जरूरी हो गया है, जिनके साथ अपने हितों को हमेशा आसानी से एक जैसा बनाना संभव नहीं होता, लेकिन जिनके साथ संबंध रखना वास्तविकता है। उन्होंने इसे "जोखिमों को संतुलित करते हुए आगे बढ़ने की रणनीति" बताया।
जयशंकर ने कहा कि इस स्थिति के बहुपक्षवाद पर पड़ने वाले प्रभावों को भी देखना होगा। उन्होंने कहा कि बहुपक्षवाद पहले से ही दबाव में है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रमुख बहुपक्षीय संस्था में गतिरोध स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि इस बदलती स्थिति का एक परिणाम छोटे-छोटे समूहों के रूप में भी सामने आ सकता है।
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म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में बोलते हुए जयशंकर ने अमेरिका के "बड़े बदलाव वाले रुख" का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह उसकी अपनी पसंद का रुख है और एक तरह से अमेरिका "जानबूझकर खुद को अधिक अकेली शक्ति बना चुका है।"
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अमेरिका-चीन की प्रतिस्पर्धा का दुनिया पर क्या पड़ा असर?
जयशंकर ने कहा, "आज के परिदृश्य की पहली प्रमुख विशेषता अमेरिका का अपने रुख में बड़ा बदलाव है। यह बदलाव उसकी पसंद का है और एक तरह से उसने जानबूझकर खुद को अधिक अकेली शक्ति बनाया है।" उन्होंने कहा कि दूसरी प्रमुख विशेषता चीन का उभार है। जयशंकर के अनुसार, चीन खुद को एक विशिष्ट देश के रूप में देखता है और वैश्विक स्तर पर दोनों के बीच काफी तीखी प्रतिस्पर्धा है।
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विदेश मंत्री ने कहा कि यह प्रतिस्पर्धा केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, इसने "किसी भी देश के पास मौजूद किसी भी प्रभाव या साधन के इस्तेमाल को एक हथियार के रूप में बदल दिया है।" उन्होंने कहा कि यह प्रतिस्पर्धा आपसी निर्भरता की जटिलता के साथ-साथ चल रही है।
उभरती और मध्यम शक्तियों के सहयोग पर जोर
जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियों के बीच जहां उनके हितों का सीधा टकराव नहीं है, वहां वे आपसी सहयोग को मजबूत करने में रुचि रखती हैं। उन्होंने कहा कि इन देशों का अमेरिका और चीन के साथ सहयोग करना भी स्वाभाविक है। उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर क्वाड का जिक्र किया। कनेक्टिविटी के क्षेत्र में उन्होंने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा और नॉर्दर्न सी रूट का जिक्र किया।
जयशंकर ने कहा कि ब्रिक्स भी इसका एक उदाहरण है, जहां विभिन्न पक्षों को लगता है कि उनकी सामूहिक आवाज अलग-अलग आवाजों की तुलना में अधिक प्रभावी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा रोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन का भी उल्लेख किया। जयशंकर ने कहा कि इन दोनों पहलों की शुरुआत भारत ने की और वे सफल रही हैं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में कई देश, जरूरी नहीं कि वे प्रमुख शक्तियां हों, अपने हितों के अनुसार एक साथ आ रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसे देश काम करने की व्यवस्थाएं बनाते हैं, एजेंडा तैयार करते हैं, संगठन विकसित करते हैं और सहयोग की आदतें विकसित करते हैं। उन्होंने इसे आज की बदलती वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा बताया।
यूरोपीय देशों को लेकर क्या बोले जयशंकर?
विदेश मंत्री ने कहा, "यूरोप दुनिया को बहुत कुछ दे सकता है। गहरी साझेदारी के लिहाज से इससे बड़ा लाभ हो सकता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि यूरोप खुद भी शायद इसके बारे में पर्याप्त रूप से जागरूक नहीं है।" उन्होंने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में यूरोप समग्र रूप से अधिक एकजुट हुआ है और इसलिए वैश्विक मंच पर बहुध्रुवीय व्यवस्था के एक ध्रुव के रूप में उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ी है।"
जयशंकर ने कहा, "आज यूरोप के पास वास्तव में एक बहुत मजबूत पक्ष है और सच कहूं तो भारत जैसे देश के लिए यूरोप से जुड़ने और उसके साथ अपने संबंधों को विकसित करने का यह बेहद मजबूत आकर्षण है।"
बहुध्रुवीयता के तेज उभार का भी जिक्र
जयशंकर ने वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवीयता के तेजी से उभरने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देशों के लिए ऐसे कई पक्षों के साथ संबंध रखना जरूरी हो गया है, जिनके साथ अपने हितों को हमेशा आसानी से एक जैसा बनाना संभव नहीं होता, लेकिन जिनके साथ संबंध रखना वास्तविकता है। उन्होंने इसे "जोखिमों को संतुलित करते हुए आगे बढ़ने की रणनीति" बताया।
जयशंकर ने कहा कि इस स्थिति के बहुपक्षवाद पर पड़ने वाले प्रभावों को भी देखना होगा। उन्होंने कहा कि बहुपक्षवाद पहले से ही दबाव में है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रमुख बहुपक्षीय संस्था में गतिरोध स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि इस बदलती स्थिति का एक परिणाम छोटे-छोटे समूहों के रूप में भी सामने आ सकता है।