Lucknow News: गंगा हमारी आस्था का विषय, इसकी निर्मलता के लिए जनभागीदारी जरूरी
वह मंगलवार को गोमतीनगर स्थित एक होटल में अमर उजाला की ओर से आयोजित ''''निर्मल गंगा-प्रदूषण मुक्त उत्तर प्रदेश'''' कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। कार्यक्रम में गंगा समेत अन्य नदियों में पहुंच रहे सीवेज और ई-कचरे से लेकर जहरीली हवा के फेफड़ों पर पड़ रहे असर तक पर चर्चा हुई।
मंत्री अरुण सक्सेना ने प्रदूषण से निपटने के लिए लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट का मंत्र दिया। कहा कि हमें अपनी जीवनशैली में ऐसे बदलाव लाने होंगे, जिससे जल, जमीन और हवा तीनों को प्रदूषण से बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि पहले कुंभ से लौटने वाले लोगों में प्रदूषित गंगा के कारण गैस्ट्रो संबंधी समस्याएं सामने आती थीं लेकिन इस बार ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिली। गंगा को निर्मल बनाने में जनभागीदारी सबसे बड़ी ताकत है। कार्यक्रम में एचडीएफसी बैंक की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मोनिका गाखर, एसबीआई उत्तरप्रदेश सचिवालय के सहायक महाप्रबंधक आलोक श्रीवास्तव समेत बड़ी संख्या में पर्यावरण कार्यकर्ता व सुधीजन माैजूद रहे।
पहला सत्र
सरकार के साथ समाज भी उठाए जिम्मेदारी
पहले सत्र में पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरण कार्यकर्ता उमाशंकर पांडेय ने कहा कि गंगा भारतीयों की आस्था और जीवन से जुड़ी हुई है। हम उसे गंगा मैया कहकर पुकारते हैं उसकी कसम खाते हैं और उसके जल को अमृत मानते हैं। ऐसे में गंगा को निर्मल और अविरल बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर पड़ाव पर पानी की जरूरत होती है, इसलिए जल संरक्षण हमारी महती जिम्मेदारी है। हम भले ही अकेले तालाब न खोद सकें लेकिन अपने खेतों पर मेड़ जरूर बना सकते हैं और उन पर पेड़ लगा सकते हैं। उन्होंने देश में जल विश्वविद्यालय स्थापित करने की भी मांग उठाई। कहा कि जब देश में कृषि विश्वविद्यालय हो सकते हैं तो जल संरक्षण, जल प्रबंधन और जल विज्ञान के लिए जल विश्वविद्यालयों की स्थापना भी होनी चाहिए। उन्होंने घरों में नहाने और बर्तन धोने के बाद निकलने वाले पानी को रीसाइकल कर दोबारा उपयोग में लाने पर जोर दिया।
उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने कहा कि गंगा और अन्य नदियों को निर्मल बनाने के लिए विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। सभी विभागों को एक दिशा और एक लय में काम करना होगा। उन्होंने ड्रेनेज और सीवेज सिस्टम को अलग-अलग समझने की जरूरत बताई। वर्तमान में करीब 6400 एमएलडी सीवेज गंगा में जा रहा है जिसमें 1600 एमएलडी का उपचार अभी नहीं हो पा रहा है। कहा कि घाटों पर पूजा-अर्चना के बाद निकलने वाले कचरे के साथ ही उद्योगों के कचरे को भी बिना उपचार नदी में जाने से रोकना जरूरी है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. आरपी सिंह ने कहा कि शहरीकरण और औद्योगीकरण दोनों तेजी से बढ़े हैं। जिस तरह स्वच्छ भारत मिशन की सफलता में लोगों की सजग सहभागिता रही, उसी तरह जल और वायु समेत सभी तरह के प्रदूषण से निपटने के लिए जनभागीदारी जरूरी है।
दूसरा सत्र
ई-कचरे के कलेक्शन से लेकर निस्तारण तक बने व्यवस्था
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अधिकारी प्रवीण कुमार ने कहा कि ई-कचरा जल, हवा और मिट्टी तीनों को प्रभावित कर रहा है। इलेक्ट्रानिक वाहनों से निकलने वाली बैटरियां और सोलर पैनल का वेस्ट भी गंभीर चिंता का विषय है। सोलर पैनल के कचरे में सिलिकाॅन समेत कई ऐसी धातुएं होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। इनका उचित तरीके से निस्तारण जरूरी है।
पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक सिंह ने कहा कि ई-कचरे के कलेक्शन से लेकर उसके अंतिम निस्तारण तक एक पूरी चेन बनानी होगी। अभी बड़ी समस्या यह है कि आम लोगों को यह पता नहीं होता कि पुराने मोबाइल, इलेक्ट्राॅनिक उपकरण और दूसरे ई-कचरे का क्या किया जाए। ई-कचरे के निस्तारण के लिए मजबूत वेस्ट-चेन तैयार करनी होगी। इसके साथ ही ई-कचरे के एंड-डिस्पोजल की स्पष्ट योजना भी सुनिश्चित करनी होगी।
तीसरा सत्र
अब बच्चों और गर्भस्थ शिशुओं के फेफड़ों तक प्रदूषण की काली छाप
प्रकृति और प्रदूषण पर आयोजित सत्र में विख्यात चेस्ट सर्जन डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि जन्म के समय हमारे फेफड़े गुलाबी और स्वस्थ होते हैं लेकिन बढ़ता वायु प्रदूषण उन्हें लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। अब धूम्रपान नहीं करने वालों के फेफड़ों पर भी प्रदूषण का असर साफ दिखाई देने लगा है। फेफड़ों पर काले धब्बे इसके नुकसान का संकेत हैं। चिंता की बात यह है कि सात-आठ साल के बच्चों के फेफड़ों में भी ऐसे धब्बे और प्रदूषण से नुकसान के संकेत दिख रहे हैं। गर्भवती महिला यदि लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेती है तो इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह ने कहा कि जल, थल और वायु जैसी प्राकृतिक नेमतें हमें मुफ्त में मिली हैं लेकिन हमने केवल इनका दोहन किया। अब प्रकृति को लौटाने की जरूरत है। जागरूकता और जनभागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज हर व्यक्ति ट्रीट किया हुआ पानी पीता है। समय रहते नहीं चेते तो कहीं ऐसा न हो कि हमें भविष्य में ट्रीट की हुई हवा में सांस लेनी पड़े। पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. जसवंत सिंह ने कहा कि जीवनशैली को इस तरह बदलना होगा कि पृथ्वी प्रदूषण मुक्त, स्वच्छ और सुंदर बनी रहे। जल और बिजली बचाने के साथ प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना होगा। पेड़ मुफ्त में हवा को शुद्ध करते हैं, इसलिए पीपल, पाकड़ और नीम जैसे पेड़ अधिक से अधिक लगाए जाने चाहिए।

अमर उजाला की ओर से हुआ ‘निर्मल गंगा-प्रदूषण मुक्त उत्तर प्रदेश’ कार्यक्रम।

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