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बादलों का मिजाज पढ़ेगा इसरो का नया रडार: अचानक बाढ़, बिजली गिरने की होगी भविष्यवाणी; कैसे काम करेगी यह तकनीक?
सार
इसरो असम के चंद्रपुर में 'क्लाउड रिसर्च रडार' लगा रहा है। यह तकनीक बादलों के भीतर होने वाले बदलावों को समझकर अचानक बाढ़, आंधी और बिजली गिरने जैसी घटनाओं की तात्कालिक चेतावनी को और सटीक बनाएगी।
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इसरो
- फोटो : एक्स/इसरो
विस्तार
आसमान में घने बादल देखकर बारिश का अंदाजा तो लगाया जा सकता है, लेकिन बादलों के भीतर कितनी तेजी से मौसम बदल रहा है, कहां भारी बारिश बनने वाली है और कब आंधी-बिजली खतरनाक रूप ले सकती है, यह जानना ज्यादा मुश्किल होता है। अब इस मुश्किल को समझने के लिए इसरो नई रडार तकनीक पर काम कर रहा है। असम के चंद्रपुर में आईएसटीआरएसी एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी (आईएआरआरएफ) स्थापित की जा रही है। यहां अगले साल फरवरी तक पहला क्लाउड रिसर्च रडार लगाने की तैयारी है।
इसका इस्तेमाल बादलों और वायुमंडल के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं को समझने के साथ मौसम की बेहतर निगरानी में किया जा सकेगा। इस नई सुविधा का टारगेट सिर्फ मौसम की जानकारी जुटाना नहीं है। इससे अचानक आने वाली बाढ़, शहरों में जलभराव, आंधी-तूफान और बिजली गिरने की तात्कालिक चेतावनी को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। भारी बारिश, ओलावृष्टि और खेती से जुड़े मौसम के अनुमान में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
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बादल के अंदर क्या हो रहा है, उसे समझेगा रडार
अभी मौसम की जानकारी के लिए उपग्रह, मौसम रडार, जमीन पर लगे सेंसर और मौसम के अनुमान वाले मॉडल से अलग-अलग तरह के आंकड़े मिलते हैं। लेकिन बादलों के भीतर पानी की बूंदों, बर्फ के कणों और हवा की गतिविधि में लगातार बदलाव होता रहता है। यही बदलाव आगे चलकर तेज बारिश, आंधी, ओलावृष्टि या बिजली जैसी घटनाओं में बदल सकते हैं। क्लाउड रिसर्च रडार का उद्देश्य ऐसे बदलावों को ज्यादा बारीकी से समझना है। इससे वैज्ञानिक यह अध्ययन कर सकेंगे कि बादल कैसे बन रहे हैं, उनमें पानी और बर्फ के कण किस तरह बदल रहे हैं और कौन-सी परिस्थितियां गंभीर मौसम की ओर इशारा कर रही हैं। यानी सिर्फ यह पता लगाना लक्ष्य नहीं है कि बारिश होगी या नहीं, बल्कि यह समझना है कि बादल के अंदर मौसम किस दिशा में बदल रहा है।
रडार से ये फायदे भी मिलेंगे
असम में क्यों बन रहा है यह केंद्र?
असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारी बारिश, बाढ़ और आंधी-तूफान जैसी घटनाएं महत्वपूर्ण मौसम संबंधी खतरे हैं। चंद्रपुर में स्थापित की जा रही यह सुविधा इस क्षेत्र के वातावरण और मौसम की वैज्ञानिक समझ बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पहला क्लाउड रिसर्च रडार फरवरी 2027 तक लगाए जाने की उम्मीद है।
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इसका इस्तेमाल बादलों और वायुमंडल के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं को समझने के साथ मौसम की बेहतर निगरानी में किया जा सकेगा। इस नई सुविधा का टारगेट सिर्फ मौसम की जानकारी जुटाना नहीं है। इससे अचानक आने वाली बाढ़, शहरों में जलभराव, आंधी-तूफान और बिजली गिरने की तात्कालिक चेतावनी को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। भारी बारिश, ओलावृष्टि और खेती से जुड़े मौसम के अनुमान में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
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बादल के अंदर क्या हो रहा है, उसे समझेगा रडार
अभी मौसम की जानकारी के लिए उपग्रह, मौसम रडार, जमीन पर लगे सेंसर और मौसम के अनुमान वाले मॉडल से अलग-अलग तरह के आंकड़े मिलते हैं। लेकिन बादलों के भीतर पानी की बूंदों, बर्फ के कणों और हवा की गतिविधि में लगातार बदलाव होता रहता है। यही बदलाव आगे चलकर तेज बारिश, आंधी, ओलावृष्टि या बिजली जैसी घटनाओं में बदल सकते हैं। क्लाउड रिसर्च रडार का उद्देश्य ऐसे बदलावों को ज्यादा बारीकी से समझना है। इससे वैज्ञानिक यह अध्ययन कर सकेंगे कि बादल कैसे बन रहे हैं, उनमें पानी और बर्फ के कण किस तरह बदल रहे हैं और कौन-सी परिस्थितियां गंभीर मौसम की ओर इशारा कर रही हैं। यानी सिर्फ यह पता लगाना लक्ष्य नहीं है कि बारिश होगी या नहीं, बल्कि यह समझना है कि बादल के अंदर मौसम किस दिशा में बदल रहा है।
रडार से ये फायदे भी मिलेंगे
- अचानक आने वाली बाढ़ की चेतावनी
- शहरों में भारी बारिश और जलभराव की निगरानी
- आंधी और बिजली की तात्कालिक चेतावनी
- हवाई अड्डों और विमानों की सुरक्षा
- भारी बारिश और ओलावृष्टि की जानकारी
- खेती में सिंचाई और फसल कटाई की बेहतर योजना
असम में क्यों बन रहा है यह केंद्र?
असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारी बारिश, बाढ़ और आंधी-तूफान जैसी घटनाएं महत्वपूर्ण मौसम संबंधी खतरे हैं। चंद्रपुर में स्थापित की जा रही यह सुविधा इस क्षेत्र के वातावरण और मौसम की वैज्ञानिक समझ बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पहला क्लाउड रिसर्च रडार फरवरी 2027 तक लगाए जाने की उम्मीद है।