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'भारत को अराजकता से बचाएं': 402 भारतीयों का संयुक्त बयान, सांविधानिक संस्थाओं को लेकर क्या चिंता जताई?

Mon, 19 Oct 2026 10:22 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल आइएएनएस, नई दिल्ली
आइएएनएस, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 19 Oct 2026 10:22 PM IST
सार

दुनिया के 27 देशों में रह रहे 402 भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों ने भारतीय लोकतंत्र को लेकर संयुक्त बयान जारी किया है। इसमें चुनावी नतीजों, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास बढ़ाने के प्रयासों पर चिंता जताई गई है। बयान में डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का भी उल्लेख है। आखिर बयान जारी करने वालों को लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने कौन-सी चुनौतियां नजर आ रही हैं? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Indian Democracy 402 Indians Across 27 Countries Raise Concerns Over Constitutional Institutions
27 देशों के भारतीयों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर क्या चिंता जताई? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दुनिया के 27 देशों में रह रहे भारतीय मूल के 402 छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर एक संयुक्त बयान जारी किया है। ‘स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की’ यानी ‘भारत को अराजकता से बचाइए’ शीर्षक वाले इस बयान में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने के लिए सड़कों पर आंदोलनों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई गई है। बयान जारी करने वालों ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशों को लोकतंत्र के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

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27 देशों में रह रहे भारतीयों ने संयुक्त बयान क्यों जारी किया?
संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत ने आजादी के बाद से अपने लोकतंत्र की मजबूती कई बार साबित की है। देश में संवैधानिक संस्थाएं मजबूत हुई हैं और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण लोकतंत्र की प्रमुख पहचान रहा है। बयान पर सहमति जताने वाले भारतीय मूल के लोगों ने चिंता जताई कि हाल के वर्षों में कुछ वर्गों के बीच चुनावी नतीजों को नकारने, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने और संसद के बजाय सड़कों पर विरोध को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें सुलझाने के लिए संवैधानिक रास्तों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
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चुनाव और न्यायपालिका को लेकर बयान में क्या कहा गया?
बयान में आरोप लगाया गया है कि जब चुनावी नतीजे किसी पक्ष के अनुकूल नहीं आते, तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाते हैं। इसी तरह, अदालतों के फैसले प्रतिकूल होने पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर टिप्पणियां की जाती हैं। बयान जारी करने वालों ने कहा कि देश की सशस्त्र सेनाओं जैसी गैर-राजनीतिक संस्था को भी राजनीतिक बहस में अनुचित तरीके से घसीटने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर ही लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति संदेह पैदा किया जा रहा है। उनके मुताबिक, लंबित न्यायिक मामलों का राजनीतिक इस्तेमाल और अराजकतावादी ताकतों का सहारा लेकर संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने के प्रयास चिंता का विषय हैं।
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डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का जिक्र क्यों किया गया?
संयुक्त बयान में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख किया गया है। बयान जारी करने वालों ने कहा कि भारत को संवैधानिक गणराज्य बनाए रखने के लिए संवैधानिक तरीकों को अपनाना जरूरी है और अराजकता के रास्ते से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति, बहस और विरोध का अपना महत्व है। हालांकि, मतभेदों को सुलझाने के लिए संवाद, चर्चा और संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। बयान में सभी सामाजिक और राजनीतिक शक्तियों से अपील की गई है कि वे विवादों को लोकतांत्रिक तरीकों से सुलझाएं और देश की संस्थाओं पर लोगों का भरोसा बनाए रखने की दिशा में काम करें।

किन देशों और प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े लोगों ने जताई चिंता?
इस बयान पर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, पोलैंड, यूक्रेन, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, इस्राइल, संयुक्त अरब अमीरात, कजाकिस्तान, जॉर्जिया और फिलीपींस समेत 27 देशों से जुड़े भारतीय मूल के लोगों ने सहमति जताई है। हस्ताक्षरकर्ताओं में एमआईटी, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, प्रिंसटन, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड और कोलंबिया विश्वविद्यालयों के साथ लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर, सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी, मैनचेस्टर विश्वविद्यालय और टोरंटो विश्वविद्यालय से जुड़े छात्र, शोधकर्ता और पूर्व छात्र शामिल हैं।


बयान जारी करने वालों ने भारत से क्या अपील की?
बयान जारी करने वालों ने कहा कि वे दुनिया के अलग-अलग देशों में रहते हुए भी भारत के भविष्य से जुड़े हैं और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी पक्ष विवेकपूर्ण रास्ता अपनाएंगे और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए काम करेंगे। बयान में भारत से दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के सामने सकारात्मक उदाहरण पेश करने की अपील भी की गई है। इसमें जोर दिया गया है कि असहमति और विरोध लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिशों से बचना चाहिए। बयान का मुख्य संदेश है कि लोकतंत्र को मजबूत रखने के लिए मतभेदों का समाधान संवैधानिक तरीकों से होना चाहिए।

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