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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   The Barapullah model of government functioning: Build the road first, then look for a solution when traffic gets stuck.

सरकारी कामकाज का बारापुला मॉडल: पहले सड़क बनाओ, फिर ट्रैफिक फंसने पर रास्ता खोजो

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 05 Oct 2026 07:44 PM IST
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सात लेन का ट्रैफिक आगे तीन लेन में सिमटा, बढ़ा जाम का दबाव, अब सिग्नल फ्री कॉरिडोर पर ट्रैफिक संभालने के लिए अब सिग्नल लगाने की तैयारी
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संतोष कुमार
नई दिल्ली। मयूर विहार फेज-1 से आईएनए तक सिग्नल फ्री सफर के लिए तैयार किया गया बारापुला एलिवेटेड कॉरिडोर फेज-दर-फेज की सरकारी प्लानिंग में उलझकर अब ट्रैफिक के बॉटलनेक में तब्दील हो गया है। अलग-अलग दिशाओं से आने वाला करीब सात लेन का ट्रैफिक आगे जाकर महज तीन लेन में सिमट रहा है। नतीजा यह कि जिस कॉरिडोर को तेज और निर्बाध आवाजाही के लिए बनाया गया था, वहीं वाहनों की रफ्तार थम रही है। सोमवार को इस उलझन से निपटने के लिए ट्रैफिक पुलिस सिग्नल का सहारा लेती दिखी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अलग-अलग समय में दिल्ली की सरकारों ने बारापुला के फेज एक-एक कर पूरे तो कर दिए, लेकिन यह सवाल समग्र रूप से नहीं सुलझाया कि इन सभी फेज से निकलने वाला ट्रैफिक आखिर जाएगा कहां। फेज-3 खुलने के बाद वर्षों पुरानी प्लानिंग की यह खामी अब सड़क पर जाम के रूप में दिखाई दे रही है। एक तरफ मयूर विहार फेज-1 से तीन लेन का अतिरिक्त ट्रैफिक आ रहा है, दूसरी तरफ पहले से चल रहे कॉरिडोर का ट्रैफिक है और आगे जाकर क्षमता सीमित हो रही है।
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बारापुला फेज-1 की योजना तैयार करने के समय से जुड़े एक वरिष्ठ अभियंता के मुताबिक, उस समय कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान खेल गांव से जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम तक खिलाड़ियों की सिग्नल फ्री आवाजाही सुनिश्चित करना मुख्य उद्देश्य था। यूटीपैक में उस समय फेज-2 पर चर्चा जरूर हुई थी, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। इसी जरूरत के हिसाब से फेज-1 में एक कैरिजवे को तीन लेन का बनाया गया। बाद में बारापुला में फेज-2 और फेज-3 जुड़ते गए। अब समस्या यह है कि पहले से चल रहे कॉरिडोर में मयूर विहार फेज-1 से आने वाली तीन अतिरिक्त लेन का ट्रैफिक भी जुड़ रहा है। ऐसे में रिंग रोड के पास सन डायल से सिग्नल फ्री आवाजाही बनाए रखना चुनौती बन गया है।
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इस तरह तैयार हुआ मयूर विहार से आईएनए तक का कॉरिडोर
-यूटीपैक के रिकॉर्ड के मुताबिक, 17 मार्च 2009 की बैठक में बारापुला नाले पर एलिवेटेड कॉरिडोर पर चर्चा हुई थी। इसके लिए कैबिनेट से करीब 550 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली।
-फेज-2 पर भी उस समय चर्चा हुई थी, लेकिन उसका विस्तृत स्वरूप सामने नहीं आया था। जून 2011 में पीडब्ल्यूडी ने इसके लिए दिल्ली सरकार की व्यय वित्त समिति से मंजूरी मांगी। सितंबर 2011 में सरकार ने इसे मंजूरी दी।
-जून 2011 में ही पीडब्ल्यूडी ने कैबिनेट को नोट भेजकर बारापुला को यमुना पार तक ले जाने की मंजूरी मांगी। सितंबर 2011 में इसे सैद्धांतिक मंजूरी मिली। बाद में यूटीपैक की 22 अगस्त 2013 की गवर्निंग बॉडी बैठक में इसका प्रस्ताव मंजूर किया गया।
-10 दिसंबर 2014 को बारापुला फेज-3 को प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी मिली।
पहले ढांचा तैयार हुआ, अब सवाल यह कि चलाएंगे कैसे
विशेषज्ञों का मानना है कि बारापुला की कहानी सरकार की कार्यशैली की दिलचस्प तस्वीर पेश करती है। फेज-1 तैयार करते समय फेज-2 व फेज-3 का ध्यान नहीं था। तीनों अलग-अलग समय में तैयार हुईं। अब पूरा तैयार होने के बाद बाद ट्रैफिक को संभालने के तरीके तलाशने जा रहे हैं। मतलब यह कि पहले इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हुआ, उसके बाद यह सवाल सामने आया कि उसे चलाएंगे कैसे।

विशेषज्ञ की राय
अब पूरा प्रोजेक्ट तैयार है। तीनों फेज अलग-अलग समय में स्वीकार और विकसित हुए। अब बात समाधान पर होनी चाहिए। एक विकल्प फेज-1 और फेज-2 को चौड़ा करना हो सकता है, लेकिन इसके लिए पर्याप्त जगह नहीं है। दूसरा विकल्प आश्रम से आने वाले लूप के मर्जिंग प्वाॅइंट को आगे बढ़ाना हो सकता है। इसमें भी आगे मथुरा रोड का लूप आने से अड़चन पैदा होगी। फिलहाल दोनों लूप पर सिग्नल लगाकर ट्रैफिक को नियंत्रित करना व्यावहारिक तरीका हो सकता है। रुक-रुककर ट्रैफिक चलने से कॉरिडोर पर दबाव कम होने की उम्मीद है। हालांकि, इसका दूसरा असर रिंग रोड पर वाहनों की लंबी कतार के रूप में सामने आ सकता है।
पवन गुप्ता, ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट एवं यूटीपैक के पूर्व सदस्य
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