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Delhi NCR News: वैन में क्षमता से कई गुना अधिक बच्चे
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सीएनजी सिलेंडर के ऊपर बनाई सीट पर भी बैठाए जा रहे हैं बच्चे
2000-3000 रुपये मासिक किराया
संवाद न्यूज एजेंसी
पूर्वी दिल्ली। ऋषभ विहार स्थित दो पब्लिक स्कूलों के बाहर ईको वैन में क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को बैठाकर ले जाया जा रहा है। एक गाड़ी में 14 से 20 बच्चे सवार होते हैं, जबकि नियमों के अनुसार 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए वाहन निर्धारित क्षमता का 1.5 गुना ही भरा जा सकता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति गाड़ी के पिछले हिस्से में है जहां सीएनजी सिलेंडर होता है, वहां भी अतिरिक्त सीट बनाकर करीब चार बच्चों को बैठाया जा रहा है, जो दिल्ली के स्कूल-कैब नियमों का खुला उल्लंघन है।
अभिभावक प्रति बच्चा 2000 से 3000 रुपये मासिक किराया देते हैं, लेकिन अधिक कमाई के लिए चालक एक चक्कर में अधिक से अधिक बच्चों को भर लेते हैं। ग्लोबल एनकैप परीक्षण में बिना एयरबैग वाली मारुति सुजुकी ईको को वयस्क सुरक्षा में शून्य स्टार मिले थे, ऐसे वाहन में ओवरलोडिंग दुर्घटना की स्थिति में खतरा और बढ़ा देती है।
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स्कूल प्रशासन का कहना है कि बसों की व्यवस्था है, पर छोटी गलियों व कम खर्च के कारण अभिभावक निजी वैन को प्राथमिकता देते हैं। सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा से समझौता कर चल रही इन गाड़ियों पर विभाग कब कार्रवाई करेगा।
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2000-3000 रुपये मासिक किराया
संवाद न्यूज एजेंसी
पूर्वी दिल्ली। ऋषभ विहार स्थित दो पब्लिक स्कूलों के बाहर ईको वैन में क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को बैठाकर ले जाया जा रहा है। एक गाड़ी में 14 से 20 बच्चे सवार होते हैं, जबकि नियमों के अनुसार 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए वाहन निर्धारित क्षमता का 1.5 गुना ही भरा जा सकता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति गाड़ी के पिछले हिस्से में है जहां सीएनजी सिलेंडर होता है, वहां भी अतिरिक्त सीट बनाकर करीब चार बच्चों को बैठाया जा रहा है, जो दिल्ली के स्कूल-कैब नियमों का खुला उल्लंघन है।
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अभिभावक प्रति बच्चा 2000 से 3000 रुपये मासिक किराया देते हैं, लेकिन अधिक कमाई के लिए चालक एक चक्कर में अधिक से अधिक बच्चों को भर लेते हैं। ग्लोबल एनकैप परीक्षण में बिना एयरबैग वाली मारुति सुजुकी ईको को वयस्क सुरक्षा में शून्य स्टार मिले थे, ऐसे वाहन में ओवरलोडिंग दुर्घटना की स्थिति में खतरा और बढ़ा देती है।
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स्कूल प्रशासन का कहना है कि बसों की व्यवस्था है, पर छोटी गलियों व कम खर्च के कारण अभिभावक निजी वैन को प्राथमिकता देते हैं। सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा से समझौता कर चल रही इन गाड़ियों पर विभाग कब कार्रवाई करेगा।