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अयोध्या: एक मैदान, दो दरबार व साझा रामलीला; हिंदू-मुस्लिम कलाकार मिलकर करते हैं मंचन, छह दशक से निभ रही परंपरा

Wed, 28 Oct 2026 08:37 AM IST
Bhupendra Singh घनश्याम सिंह, अमर उजाला, अयोध्या

सार

अयोध्या के मुमताज नगर में 1963 से चली आ रही यह रामलीला हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा संस्कृति की अनूठी मिसाल है। यहां दोनों समुदाय मिलकर इसका आयोजन करते हैं और स्थानीय लोग ही इसके सभी किरदार निभाते हैं।
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मुमताज नगर में रामलीला का मंचन करते कलाकार। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मैदान के एक छोर पर राम का दरबार, दूसरे पर रावण का। बीच में खुले मैदान में रामकथा के प्रसंगों का मंचन और दर्शकों के बैठने की परंपरागत व्यवस्था। अयोध्या के मुमताज नगर की यह रामलीला छह दशक से अधिक समय से सांप्रदायिक सौहार्द और साझा सांस्कृतिक विरासत की मिसाल बनी हुई है। वर्ष 1963 में शुरू हुई इस रामलीला में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर आयोजन करते हैं और मंच पर विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते हैं।
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श्री रामलीला रामायण समिति ट्रस्ट, मुमताज नगर की इस रामलीला में हर साल स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इस बार शाहीन अली, मोहम्मद इकलाख, जाबीर अली और मोहम्मद रईस समेत पांच-छह मुस्लिम कलाकार अलग-अलग पात्रों की भूमिका निभा रहे हैं। आयोजन की व्यवस्थाओं से लेकर मंचन तक में मुस्लिम समुदाय की सक्रिय भागीदारी रहती है।

समिति के कोषाध्यक्ष राजेश कुमार तिवारी के मुताबिक, यह रामलीला सामाजिक सौहार्द की अनूठी मिसाल है। मुस्लिम समाज के लोग गर्व से रावण के सेनापति और सेना के सदस्यों सहित अन्य पात्रों की भूमिकाएं निभाते हैं। आयोजन में दोनों समुदायों का सहयोग इसकी परंपरा को मजबूत बनाता है।
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स्थानीय लोग ही निभाते हैं किरदार

इस रामलीला की खासियत यह भी है कि यहां बाहरी कलाकारों के बजाय स्थानीय लोग ही पात्र बनते हैं। इनमें बैंककर्मी, ग्राम प्रधान, किसान, एलआईसी एजेंट और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बीच समय निकालकर ये लोग तैयारी करते हैं और मंच पर रामकथा के प्रसंगों को जीवंत बनाते हैं। दर्शकों के लिए भी ये कलाकार अपने आसपास रहने वाले परिचित चेहरे हैं, जिससे आयोजन से उनका जुड़ाव बना रहता है।

बदलते समय में मंच सज्जा, प्रकाश और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने के बावजूद यहां पारंपरिक मैदानी रामलीला का स्वरूप कायम है। मैदान के दोनों छोर पर राम और रावण के दरबार सजते हैं और बीच में कथा का मंचन होता है। अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद के दौर में भी यह आयोजन जारी रहा।
 
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पिता से बेटे तक पहुंची विरासत

रामलीला की शुरुआत पॉलिटेक्निक के शिक्षक रहे जगदीश प्रसाद शर्मा ने स्थानीय निवासी जुगुल किशोर शर्मा, रामचंद्र तिवारी, रामदयाल, डॉ. वाजिद अली, हिदायत अली और अशरफ अली के साथ मिलकर की थी। उस समय सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के उद्देश्य से मुस्लिम समुदाय के लोगों ने रामलीला समिति का गठन किया था।

डॉ. वाजिद अली मौजूदा अध्यक्ष डॉ. सैयद माजिद अली के पिता थे। शुरुआती दो-तीन वर्षों तक वह समिति के उपप्रधान रहे, फिर करीब 18 वर्षों तक अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। अब उनके बेटे डॉ. सैयद माजिद अली समिति के अध्यक्ष और मुख्य ट्रस्टी हैं तथा लंबे समय से आयोजन से जुड़े हैं। हालांकि, राजेश कुमार तिवारी के अनुसार, इन दिनों उनकी तबीयत ठीक नहीं है और वह मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती हैं। इसके बावजूद समिति के सदस्य रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।
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