20 फरवरी, 1947 को ब्रिटेन के उस वक्त के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने एक ऐतिहासिक घोषणा की थी, उन्होंने कहा था कि ब्रिटिश हुकूमत 30 जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण भारतीय हाथों में कर देगी। ऐसे में भारत को आजादी मिलने का समय 1948 के मध्य में था।
हालांकि, उस समय में देश की स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं थी। श्रमिक अंदोलन, विद्रोह और लोगों के बीच बढ़ते असंतोष ने ब्रिटिश हुकूमत को 10 महीने पहले ही देश से शासन छोड़ने पर मजबूर कर दिया। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस आदि नायकों के नेतृत्व में देश एकजुट हो रहा था।
1942 में देश ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। वहीं दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद तक देश ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट हो चुका था। इन सब को देखते हुए ब्रिटिश सरकार यह जान चुकी थी कि भारत में ज्यादा दिन तक शासन चलाना संभव नहीं है।
इसी बीच मार्च 1947 में लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत के आखिरी वायसराय बनाकर भेजा जाता है। इनको यह जिम्मेदारी दी गई थी कि सत्ता का हस्तांतरण ठीक ढंग से भारत को करना था। उनके पास इस कार्य को करने के लिए करीब डेढ़ साल साल का समय था। हालांकि, देश में स्थिति जिस तेजी से खराब हो रही थी उसे देखते हुए माउंटबेटन को यह पता चल गया था कि अगर सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को पूरा करने में ज्यादा समय लगा तो स्थिति खराब हो सकती है।
इसी बीच 3 जून 1947 को यह योजना बनाई गई कि ब्रिटिश सरकार भारत को दो हिस्सों भारत और पाकिस्तान में बांटेगी। इस फैसले को कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार किया। जुलाई 1947 में ब्रिटिस संसद ने भारत के स्वतंत्रता अधिनियम को पास किया। इसमें यह तय किया गया कि 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र देश बनेंगे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 15 अगस्त को देश आजाद करने का फैसला लॉर्ड माउंटबेटन का ही था। इसके पीछे की एक मुख्य वजह यह थी कि 15 अगस्त 1945 को जापान की सेना ने मित्र राष्ट्रों के समक्ष सरेंडर किया था। इसे उस समय विक्ट्री ओवर जापान डे के तौर पर मनाया गया था। यह माउंटबेटन की सैन्य जिंदगी की एक बड़ी कामयाबी भी थी।