दरअसल भाजपा के नेता जिस तरह से सपा-कांग्रेस के खिलाफ उनके शासनकाल में घटित घटनाओं को अपने भाषण का हिस्सा बना रहे हैं, उससे भी साफ है कि 2027 के चुनावी रणनीति में भी भाजपा यह जनता के मन में यही बिठाने की कोशिश करेगी कि सपा के दौर की तुलना में भाजपा सरकार ने कानून-व्यवस्था, विकास और गरीब कल्याण के मोर्चे पर क्या बेहतर किया? यानि ऐसे सवालों को तूल देकर भाजपा अपने शासन के ‘रिपोर्ट कार्ड’ पर केंद्रित करने को अपनी रणीनीति का हिस्सा बनाएगी।
‘सपा से बेहतर भाजपा क्यों?’भाजपा इस सवाल का जवाब नारे से नहीं, आंकड़ों से देने की कोशिश करेगी। साथ ही अपराध और कानून-व्यवस्था, बिजली, महिला सुरक्षा, माफिया पर कार्रवाई और गरीब कल्याण...इन पांच मोर्चों पर सरकार-दर-सरकार तुलनात्मक रिपोर्ट कार्ड सामने रखकर पार्टी 2027 की चुनावी बहस को ‘कौन बेहतर शासन देता है' के सवाल पर ले जाने की भी कोशिश करेगी। भाजपा की मौजूदा रणनीति के संकेत साफ हैं कि इस बार चुनावी मैदान में सिर्फ वोट नहीं, शासन के रिपोर्ट कार्ड की भी परीक्षा होगी।
महिला अपराध भाजपा के लिए संवेदनशील लेकिन महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा होगा। महिला हेल्पलाइन, मिशन शक्ति, पुलिस रिस्पांस सिस्टम और थानों में महिला संबंधी शिकायतों की व्यवस्था को सपा शासनकाल से तुलना के साथ पेश करने पर फोकस किया जा सकता है। भाजपा सिर्फ अपराध घटने का दावा नहीं बल्कि एफआईआर, अपराध दर, चार्जशीट और दोषसिद्धि के आंकड़ों के जरिए यह बताने की कोशिश करेगी कि व्यवस्था में वास्तविक बदलाव कितना आया है।
सपा के पीडीए के मुकाबले भाजपा गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित, सवर्ण और विभिन्न छोटे सामाजिक समूहों को साथ बनाए रखने की रणनीति अपनाएगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं, जबकि सपा ने 37 सीटें जीतीं। यही कारण है कि 2027 के लिए भाजपा के लिए सामाजिक समीकरण पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। यानी संदेश देने की कोशिश होगी कि भाजपा सरकार का लाभ जाति देखकर नहीं, जरूरत के आधार पर मिला।