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Jammu News: पत्नी के हत्यारोपी को जमानत, कोर्ट ने कहा - पूरी सुनवाई बगैर दीर्घकाल तक जेल में रखना उचित नहीं

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एक दशक बीत जाने के बाद भी 50 गवाहों में से महज 23 से हुई पूछताछ
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने मंगलवार को पत्नी की हत्या के एक आरोपी को जमानत देते हुए उसे रिहा करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि त्वरित न्याय के मौलिक अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती। केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर बगैर सुनवाई पूरी हुए किसी को लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

याचिकाकर्ता 29 अप्रैल, 2016 से हिरासत में है। उसके खिलाफ डोडा के ठाठरी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज हैं। उसके खिलाफ रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) की धारा 302 और 109 लगाई गई हैं। मामले में एक दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद अभियोजन पक्ष 50 में से केवल 23 ही गवाहों से पूछताछ कर सका। जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी ने डोडा जिला निवासी हामिद हुसैन की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए सुनवाई में अत्यधिक देरी पर कड़ा संज्ञान लिया।
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हामिद हुसैन को दो-दो लाख रुपये के व्यक्तिगत और जमानती बॉन्ड भरने को कहा। साथ ही शर्तें भी लगाई कि आरोपी के पास पासपोर्ट है तो उसे तुरंत जमा करे, ट्रायल कोर्ट की अनुमति बिना भारत से बाहर यात्रा न करे, अभियोजन पक्ष के गवाहों को धमकाने या प्रभावित करने से बचे, मुकदमे की कार्यवाही के दौरान अदालत में मौजूद रहे और मुकदमे के पूरा होने तक मृतक के परिवार के सदस्यों या रिश्तेदारों के सामने न जाए।
जेएनएफ


पत्नी की गला दबाकर हत्या के आरोप से जुड़ा है मामला...

अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने अपनी पत्नी का गला दबाकर हत्या कर दी और फिर उस पर केरोसिन (मिट्टी का तेल) डालकर आग लगा दी। जांच के बाद ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट पेश की गई। इसके आधार पर 22 फरवरी, 2017 को आरोपी और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए। कोर्ट ने पाया कि जब 17 दिसंबर, 2024 को ट्रायल कोर्ट ने पिछली जमानत याचिका खारिज की थी, तब तक अभियोजन पक्ष के केवल 19 गवाहों से ही पूछताछ हो पाई थी। आरोपी के वकील की दलील थी कि किसी आरोपी को केवल इसलिए अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता कि उस पर कोई गंभीर आपराधिक आरोप है। खासकर तब, जब अभियोजन पक्ष अपने गवाहों से समय पर पूछताछ करने में विफल रहा है।
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सह आरोपी को मिल चुकी पहले ही जमानत
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि मामले में सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। लंबे समय तक जेल में रहने, मुकदमे की धीमी गति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक संरक्षण को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को कड़ी शर्तों के साथ जमानत देना न्याय के हित में माना।
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