डोगरी संस्था से जुड़े तीन दशक पुराने सदस्यता विवाद को केवल अकादमिक कवायद करार दिया
जम्मू। समय के साथ जो विवाद प्रासंगिकता खो चुके हैं, उन पर अदालतों का सुनवाई करते रहना उचित नहीं। यह टिप्पणी करते हुए जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने डोगरी संस्था से जुड़े एक सिविल मामले में दूसरी अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि संस्था के तीन दशक पुराने सदस्यता विवाद को आगे जारी रखना केवल एक अकादमिक कवायद होगी।
जस्टिस शहजाद अजीम ने फैसला सुनाते हुए कहा कि 1993-1996 की अवधि के लिए सदस्यता नवीनीकरण से जुड़े इस विवाद में अब कोई भी प्रभावी या लागू करने योग्य राहत नहीं दी जा सकती। बता दें कि यह अपील डोगरी संस्था, करण नगर, जम्मू के अध्यक्ष और महासचिव की ओर से दायर की गई थी। इसमें उन्होंने जम्मू के प्रथम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के 29 नवंबर 2013 के सदस्यता नवीनीकरण के मुकदमे को खारिज करने संबंधी फैसले और डिक्री को चुनौती दी थी।
विवाद तब शुरू हुआ, जब एनडी जमवाल और मोहन सिंह ने डोगरी संस्था में अपनी सदस्यता को तीन साल के लिए और बढ़ाने (नवीनीकरण) की मांग की थी। निचली अदालत ने उनके मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे सदस्यता नवीनीकरण के हकदार नहीं हैं, क्योंकि उनकी गतिविधियां संस्था के हितों के खिलाफ मानी गई थीं। 2013 में पहली अपीलीय अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद डोगरी संस्था ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इस दूसरी अपील को 4 मार्च 2014 को मंजूरी दी गई थी। इसमें उठाए गए सवालों में यह भी शामिल था कि क्या किसी पंजीकृत संस्था की सदस्यता को उसके मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (संस्था के नियमों/उद्देश्यों के दस्तावेज) के विपरीत अधिकार के रूप में मांगा जा सकता है? क्या कोई सिविल कोर्ट संस्था के संविधान में तय कार्यकाल के बावजूद सदस्यता को जारी रखने का निर्देश दे सकता है?
हाईकोर्ट ने पाया कि सदस्यता की विवादित अवधि (1993–1996) उस समय से लगभग 17 साल पहले ही समाप्त हो चुकी थी, जब 2013 में प्रथम अपीलीय न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि सदस्यता की समाप्त हो चुकी अवधि को लेकर कार्यवाही जारी रखने का कोई फायदा नहीं है। खासकर जब उस अवधि से संबंधित आदेश को व्यावहारिक रूप से लागू ही नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अपील को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि किसी बाद की सदस्यता अवधि के संबंध में पक्षों के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। साथ ही, निचली अदालतों द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों को भविष्य के किसी भी मामले के लिए बाध्यकारी नहीं माना जाएगा। जेएनएफ