दरअसल, राज्य के नियमों में छह महीने से कम सेवा अवधि वाले अधिकारी को भी डीजीपी बनाने की अनुमति दी गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट इन नियमों को रद्द करता है, तो इसका सीधा असर तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर पड़ सकता है। इसी वजह से अदालत ने उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया है।
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सत्ता में कौन है, इससे अदालत का सरोकार नहीं: जस्टिस जॉयमाल्या बागची
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने साफ कहा कि अदालत की चिंता इस बात से नहीं है कि केंद्र या राज्य में किस दल की सरकार है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके घोषित कानून को कमजोर या बेअसर न किया जाए। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को जीडीपी की नियुक्ति से जुड़े नियमों पर एक सप्ताह के भीतर दोबारा विचार करने या उन्हें उचित ठहराने का निर्देश दिया है।
दूसरे राज्यों के नियम भी देखे जाएंगे
शीर्ष अदालत ने मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी से अन्य राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े कानूनों और नियमों का भी अध्ययन करने को कहा है। इसके जरिए सुप्रीम कोर्ट अलग-अलग राज्यों की व्यवस्थाओं की तुलना करेगा और यह देखेगा कि वहां डीजीपी नियुक्ति के नियम उसके पहले के निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।
क्या है पूरा मामला?
झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति को लेकर विवाद उस समय बढ़ा, जब राज्य सरकार ने आठ जनवरी 2025 को डीजीपी नियुक्ति के लिए नए नियम बनाए। केंद्र का आरोप है कि इन नियमों में सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में तय प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। इस फैसले के मुताबिक राज्य सरकार को यूपीएससी की ओर से तैयार तीन अधिकारियों के पैनल में से डीजीपी चुनना होता है और अधिकारी के पास नियुक्ति के समय कम से कम छह महीने की सेवा बची होनी चाहिए। इसके बावजूद अनुराग गुप्ता को फरवरी 2025 में डीजीपी बनाया गया, जबकि उनकी करीब तीन महीने की सेवा बची थी।