देश भर में डिजिटल पेमेंट क्रांति का मुख्य आधार बने यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के माध्यम से होने वाले बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर शुल्क लगाने की केंद्र सरकार की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने 14 और 15 सितंबर 2026 को वित्त मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्रित अधिसूचनाओं के क्रियान्वयन पर तुरंत अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि ₹2,000 से अधिक के व्यावसायिक लेन-देन पर शुल्क लगाने से अर्थव्यवस्था में नकदी और काले धन के लेन-देन में बढ़ोतरी हो सकती है, और व्यापारी इस अतिरिक्त लागत का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं।
इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एन. वेंकटरमन ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि ये नियम 15 अक्तूबर 2026 से प्रभावी होंगे। सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि:
पीठ की ओर से न्यायमूर्ति बागची ने आयकर अधिनियम की धारा 269SU का हवाला देते हुए सवाल किया कि यदि कानून डिजिटल हस्तांतरण की अनुमति देता है, तो इस लेन-देन में कानूनी बाध्यता का स्रोत क्या है और सरकार का इसमें कार्यकारी अधिकार क्षेत्र क्या है। इसके जवाब में अदालत ने सरकार को हलफनामे के जरिए सभी तथ्य पेश करने का निर्देश दिया।
अधिसूचना के अनुसार, सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम जनता और छोटे कारोबारियों को इस फैसले से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि लगभग 96% मर्चेंट लेन-देन पूरी तरह अप्रभावित रहेंगे।
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) वह शुल्क है जो मर्चेंट भुगतान को प्रोसेस करने में शामिल संस्थाओं (बैंकों और पेमेंट्स सर्विस प्रोवाइडर्स) के बीच वितरित किया जाता है। नए ढांचे के तहत दरें इस प्रकार तय की गई हैं। मानक दर ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट लेन-देन पर 0.4% का मानक एमडीआर लागू होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन के लिए अधिकतम शुल्क ₹300 तय किया गया है।
वित्त मंत्रालय ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A में संशोधन के जरिए यह व्यवस्था बनाई है। सरकार ने बैंकों और यूपीआई ऐप प्रदाताओं को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे मर्चेंट्स को यह शुल्क आम उपभोक्ताओं पर स्थानांतरित करने की अनुमति न दें। साथ ही, ऐप प्रदाताओं द्वारा किसी भी प्रकार का छिपा हुआ प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।